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  • क्या क्षयरोग से पा लेंगे 2025 तक मुक्ति, सरकारी प्रयासों के पड़ताल की जरूरत
  • March 24, 2018
  •                                                  कैसे होगा क्षय रोग का क्षय

    अंशुमान त्रिपाठी
     
    आज विश्व क्षय रोग दिवस है. क्षय यानि टीबी से दुनिया भर में हर साल 17 लाख लोगों की मौत हो जाती है. भारत में टीबी दो लाख से ज्यादा लोगों की जान ले लेती है. पिछले वर्ष तो चार लाख लोगों को प्राण गंवाने पड़े. क्षय रोग संक्रमण के मामले में भारत शीर्ष तीन देशों में से एक है. 
    हाल ही में हुए शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीबी संक्रमण की गंभीरता को रेखांकित किया. उन्होंने इसके पूरी तरह उन्मूलन के लिए 2025 का संकल्प रखा. जबकि दुनिया भर में इसका लक्ष्य 2030 तक तय किया गया है. जरूरी भी है, क्योंकि ये संक्रामक बीमारी है, युवा पीढ़ी को प्रभावित कर रही है, जाहिर है कि पूरे राष्ट्र और उसकी क्षमता पर असर पड़ रहा है. देश का गरीब तबका सबसे ज्यादा इसकी चपेट में है.
    समस्या घोषणाओं में नहीं है, समस्या है योजनाओं के अमल में. प्रधानमंत्री ने राज्यों को निर्देश दे दिया, स्वास्थ्यकर्मियों की ज़िम्मेदारी का अहसास कराया. टीबी संक्रमण की गंभीरता को देखते हुए 2012 में सूचनात्मक रोग घोषित किया जा चुका है. इसकी सूचना ना देने पर दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है. स्वास्थ्यकर्मियों की कोताही पर सख्ती को भी समझा जा सकता है. डॉक्टर, केमिस्ट, औषधि-विक्रेता और अस्पताल के अधिकारी, एक व्यक्ति में क्षयरोग के प्रसार की रिपोर्ट देने में यदि विफल रहते हैं तो उन्हें जेल भेजा जा सकता है। उन्हें छह महीने या दो साल तक की सजा हो सकती है।
    लेकिन सवाल ये है कि इस कानून के आधार पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है.टीबी उन्मूलन में सबसे बड़ी बाधा बीमारी को छुपाने और पूरा इलाज ना करवाने की है. अगर कानून को मजबूती से लागू किया गया होता तो रोग के प्रसार की ये स्थिति ना खड़ी होती. हालात ये हो गए हैं कि 1997 में संशोधित राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत डॉट्स चलाए जाने के बावजूद रोग की संतोषजनक रोकथाम ना हो सकी. आज के दौर में पूरी तरह उपचार ना होने के कारण मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी फैलना शुरू हो गया है. जिसमें दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा होती है. टीबी का जीवाणु जब दो मुख्य दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है तो उसे एमडीआर टीबी कहते हैं. जब कुछ और दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है तो एक्सडीआर टीबी कहते हैं.
    जनता को क्षयरोग के बारे में शिक्षित करने के हेतु जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं और इसके लक्षणों को पहचानकर तुरंत ही इसका इलाज शुरू कर दिया जाता है। खासतौर पर गरीब वर्ग के लोगों में ये संक्रमण फैलता है. इसीलिए देश में सघन जागरूकता अभियान की जरूरत है.
     
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