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  • उज्वला से उज्वल नहीं हो पा रहा गरीब महिलाओं का भविष्य
  • May 28, 2018
  •  उज्वला से उज्वल नहीं हो पा रहा गरीब महिलाओं का भविष्य

    अंशुमान त्रिपाठी
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उज्वला की लाभार्थी महिलाओं ने ढेर सारी शुभकामनाऐं और आशीर्वाद दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उज्वला योजना को एक बहुत सकारात्मक कदम के रूप देखा जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों में गैस चूल्हा आज भी एक सपने की तरह रहा है. प्रधानमंत्री की इस योजना ने गैस चूल्हा को सर्वसुलभ बना दिया. 
     1 मई, 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बलिया से इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की. करीब दस करोड़ परिवारों को लकड़ी, कोयला के धुंए से मुक्ति दिलाने के मकसद से बीपीएलकार्ड धारी महिलाओं के लिए ये योजना शुरू की गई. उज्वला योजना के लिए सिर्फ महिलाएं ही आवेदन कर सकती हैं बशर्तें उनका नाम 2011 की जनगणना में दर्ज हो. शुरुआत में सरकार ने पांच करोड़ गैस कनेक्शन का लक्ष्य रखा जिसमें से दो साल के भीतर  तीन करोड़ साठ लाख कनेक्शन बांट दिए गए. अब 2020 तक आठ करोड़ गैस कनेक्शन बांटने का लक्ष्य तय किया गया है.
    निस्संदेह गरीबी रेखा के नीचे जीने वाली महिलाओं और उनके परिवारों के लिए ये योजना सपने की तरह है. वजह यही है कि प्रधानमंत्री से संवाद करने वाली कई मुस्लिम महिलाएं उन्हें दुआऐं दे रही हैं. उनके राजनीतिक भविष्य की कामना कर रही हैं. रमजान में ऐसी दुआएं मिलना वाकई फख्र की बात है. और इसके साथ ही 4 करोड़ महिलाओं को सौभाग्य योजना के तहत बिजली कनेक्शन देने का भी फैसला किया गया है.
    उज्वला योजना की शुरुआत जहां सरकार के लिए गर्व का विषय है, वहीं ज़मीन पर अमल में दिक्कतों को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता. पहले दो साल में ही बीपीएल परिवारों के लिए सिलेंडर भारी पड़ने लगा है. बहुत से परिवारों में में ये मेहमान के आने पर या किसी तीज़-त्यौहार पर काम आने वाली चीज़ होता जा रहा है. लेकिन प्रधानमंत्री का संवाद सिर्फ उन महिलाओं से कराया गया जिनके लिए इतनी माली दिक्कतें नहीं हैं. हालांकि इसे दुष्प्रचार समझा जा रहा है क्योंकि नौकरशाही राजनीतिक सत्ता की आंखों में पट्टी बांधने का काम करती है और भ्रष्टाचार के रास्ते निकाल लेती है.
    इसे नौकरशाही की शरारत ही मानना चाहिए कि दरसल उज्वला योजना मुफ्त गैस कनेक्शन की योजना नहीं रही. आधा दाम कनेक्शन देते वक्त ले लिया जाता है तो आधा अगले छह सिलेंडरों की सब्सिडी काट कर वसूला जाता है. बाकी शरारतें की जाती हैं सो अलग. हालात ये है कि जो तबका बमुश्किल 1750 रुपए जोड़ कर ये सपना खरीदता है, वो अगले छह महीनें तक सब्सिडी रहित सिलेंडर खरीदने की हालत में नहीं रहता. यही वजह है कि रिफिल ना करवाने की समस्या को देखते हुए पिछले माह से सिलेंडरों पर सब्सिडी कटौती को बंद करना पड़ा है.
    दरसल ना तो मुफ्त में गैस कनेक्शन दिया गया, ना ही मार्च, 2018 तक सिलेंडर पर सब्सिडी ही मुह्यया कराई गई. गैस कनेक्शन लेते वक्त 1750 रुपए का भुगतान करना पड़ता है. जिसमें से 990 रुपए गैस चूल्हे का दाम लिया जाता है और 760 रुपए का पहला सिलेंडर पड़ता है. सरकार कहती है कि वो हर गैस कनेक्शन पर 1600 रुपए की माली मदद मुह्य्या करा रही है. लेकिन असलियत ये है कि पहले छह सिलेंडर भरवाने पर सब्सिडी नहीं दी जाती. सरकार उपभोक्ता के पैसों में से सब्सिडी का पैसा काट लेती है और छह सिलेंडरों पर कुल सब्सिडी 1740 रुपए सरकार की जेब में जाते हैं. यानि पहले छह सिलेंडर जो करीब साढ़े सात सौ से 900 रुपए के बीच पड़ते हैं. उस पर प्रति सिलेंडर करीब 240 से 290 रुपए की सब्सिडी के हिसाब से कुल 1740 रुपए की सब्सिडी सरकार वापस ले लेती है. वहीं शुरुआत में उपभोक्ता को 1750 रुपए चुकाने ही पड़ते हैं.अगर कुछ मुफ्त है तो करीब डेढ़ सौ रुपए का रेगुलेटर. उसके बदले भी गैस चूल्हे का बर्नर पीतल के बजाए लोहे का दिया जाता है. गैस पाइप भी छोटा दिया जाता है.
           आलम ये है कि सिलेंडर रिफिल करवाने से लोग हिचकिचाते है. दो में से एक उपभोक्ता ही हर माह सिलेंडर भरवाता है. हर तीसरा उपभोक्ता तीन महीने तक सिलेंडर चलाता है. साफ है कि अब भी गरीब तबके की महिलाएं लकड़ी या दूसरे धुंए वाले ईंधन के इस्तेमाल के लिए मजबूर हैं.
     
                            उज्वला योजना के अमल में धांधली को लेकर महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों से शिकायतें आने लगीं हैं. बताया जा रहा है कि अहमदनगर, नासिक और ठाणे ज़िलों में गरीब महिलाओं ने एलपीजी सिलिंडर महंगा मिलने की वजह से मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाना फिर शुरू कर दिया है. कई जगहों पर गैस कनेक्शन के लिए लोगों को 2000 रुपये से 8000 रुपये तक देना पड़ा है. हालांकि सरकार ने कहा है कि  इस योजना के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई का प्रावधान है. अभी तक इस योजना का दुरुपयोग करने के लिए 97 डिस्ट्रिब्यूयटरों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है. सरकार ने माना है कि ये योजना पूरी तरह दोष रहित नहीं है. साथ ही सरकार ने भरोसा दिलाया है कि My LPG पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज करवाने पर दोषी के खिलाफ सख्ती कार्रवाई की जाएगी.ऐसे में  सरकार से उम्मीद की जा रही है कि इस योजना में खामियों को दूर करने के लिए जल्द ही कदम उठाए जाएंगे.
     
                         हालांकि इसमें शक नहीं है कि सरकार ने देश के सुदूर ग्रामीण इलाकों तक गैस कनेक्शन पहुंचाने की दिशा में ऐतिहासिक काम किया है. आजादी के बाद से अब तक शहरी और ग्रामीण इलाकों में 2014 तक सिर्फ 13 करोड़ परिवारों तक एलपीजी कनेक्शन पहुंचा था. लेकिन इसे गरीबों को मुफ्त गैस कनेक्शन बताना सही नहीं है. प्रधानमंत्री समेत सरकार बार-बार अमीरों से सब्सिडी छोड़ने की भी अपील कर रही है. ऐसे में अगर गैस कंपनियों के लिए ग्रामीण बाज़ार कोलने की कवायद भर नहीं करनी है और गरीबों का सही मायने में भला करना है तो इन कमियों को दूर करना होगा.
    लेकिन इससे भी बड़ीबात ये है कि अगर बाज़ार तैयार करने की मंशा नहीं है तो पंचायत स्तर सामूहिक गोबर गैस प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए था. जो स्थाई और कम खर्चीला उपचार हो सकता है. साथ ही ज़रूरत भर की बिजली की भी आपूर्ति संभव हो सकती है.  सरकारों को इसके लिए पूंजीपतियों की नज़रों से गांव को देखने के बजाय स्वावलंबी ग्राम व्यवस्था बनाने के लिए काम करने की जरूरत है.
     
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