• मोदी गए मगहर, क्या है कबीर का प्रधानमंत्री को संदेश
  • June 28, 2018
  •   कबीर के मगहर से क्या है प्रधानमंत्री को संदेश

     
       अंशुमान त्रिपाठी
     
                  संत कबीर के 250वें प्राकट्य उत्सव और 500वें परिनिर्वाण वर्ष के उपलक्ष्य पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संत कबीर नगर पहुंचे. उस कबीर की धरती पर  जिसने चौदहवीं सदी में पोंगे-पंडितों और मुल्ले-मौलवियों के कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई छेड़ी थी. प्रधानमंत्री मोदी ने कबीर की समाधि पर चादर चढ़ाई औऱ उनको नमन किया. 
               प्रधानमंत्री ने इस मौके पर कहा कि संत कबीर भारत की आत्मा के मूल का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्होंने जाति के बंधनों को तोड़ा और सामान्य ग्रामीण भारतीय की भाषा बोली. जहां कबीर ने जांत-पांत, धर्म-मजहब की बुराईयों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी, कबीर की उसी धरती से पीएम मोदी ने विपक्ष पर हमला बोला. प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ लोग महापुरुषों की आड़ में राजनीति करते हैं और समाज में असंतोष फैलाते हैं. उन्होंने समाज में फैले असंतोष, असमानता औऱ द्वैष की बात तो की लेकिन कबीर का संदेश नहीं समझ पाए. प्रधानमंत्री से उम्मीद थी कि वो वहां से सर्वसमाज के लिए संदेश देंगे लेकिन ऐसा ना हुआ. ऐसे में देखते हैं कि मगहर से कबीर को प्रधानमंत्री को क्या संदेश दिया.
         कबीर का संदेश इसलिए कि आज के दौर में कबीर की प्रासंगिकता बढ़ गई है. देश में फैल रहे सांप्रदायिकता के जहर के असर को कबीर ने तब ही भांप लिया था. उस कबीर को आज, जिसे कोई संत, कोई क्रांतिकारी तो कोई समाजसेवी कहता है। वो कबीर ही है जिसे कोई हिंदू कहता है तो कोई मुसलमान बताता है. कबीर का धर्म हिंदू औऱ मुस्लिम धर्म से परे नहीं था, बल्कि किसी भी धर्म की मूल भावना से जुड़ा था और कर्मकांड विरोधी था. 
                     आज के दौर में जब सनातनी हिंदुत्व का विश्वबंधुत्व भाव कहीं खो गया है, कर्मकांडों,जातिवाद,सांप्रदायिकता जैसी बुराईयों ने दोनों धर्मों को ग्रस लिया है, ऐसे में आज कबीर बहुत याद आते हैं. 
    कांकर-पाथर जोड़ के मस्ज़िद लेय बनाय ।
    तापर चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ।।
    वो कबीर ही थे जो चौदहवीं सदी में मुस्लिम धर्म से जुड़ी बुराईयों की खुल कर आलोचना की थी और उन्हें उनके धर्म का मर्म बताते हुए कहा था कि 
    सूरा सो पहचानिए जो लड़ै दीन के हेत।
    पुरजा-पुरजा कट मरे, कबहूं न छाड़ै खेत।।
    कबीर के उस दीन को अगर मुसलमान आज समझ पाते तो शायद दुनिया में आतंकवाद कभी जन्म नहीं लेता. हालांकि आतंकवाद की वजह कई और भी है लेकिन कट्टरपंथ ने नासमझ लोगों को फुसलाने में खासी भूमिका अदा की है. इसी नासमझी की वजह से दोनों सांप्रदायिकताएं एक दूसरे को मोटा कर रही हैं. प्रतिक्रिया में हिंदु कट्टरपंथ भी पनपता जा रहा है. वही हिंदुत्व जो वसुधैव कुटुंबकम की मूल भावना का हामी था. आज हिंसा को प्रेम से जीतने के बजाय प्रतिहिंसा का उपदेश दिया जा रहा है. कबीर इसके एकदम खिलाफ थे.
    पोथी पढि- पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
    ढाई अच्छर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।
    कबीर बताते हैं कि प्रेम ही मानव धर्म है. लेकिन हालत ये है कि आज देश में प्रेम का संदेश देना मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़ दिया गया है. कौमी एकता औऱ भाईचारे की बात को मुसलमानों का समर्थन मानी जाने वाली हैं. पोंगे पंडित, भगवा पहन त्रिशूल उठा कर एक नई हिंदू कौम तैयार करने पर उतारू हैं, जो धर्म के नाम पर हिंसा करने को आमादा हो जाएं। लेकिन वो कबीर ही थे जो कहते थे
    सोई हिंदू सो मुसलमान, जिनका रहे इमान।
    सो ब्राह्मण जो ब्राह्म गियाला, काजी जो जाने रहमान।।
    कबीर का धर्म मानव धर्म था. वो मानव धर्म जो किसी भी धर्म का मूल है। बाकी सब तो अपने फायदे में की गई जोड़तोड़. जब धर्म के नाम पर मंदिरों में भगवानों को कैद कर लिया गया तो भक्ति आंदोलन ने उन्हें मुक्त कराया. कबीर वही भक्त कवि हैं जिन्होंने कह दिया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा. वो साहस कबीर का ही था काशी के पंडों और धर्म के ठेकेदारों से लोहा लेकर उन्हें हिंदुत्व के सही माने सिखाते रहे. कहते रहे कि 
    संतों पंडे निपुण कसाई,
    बकरा मारि भैंसा पर धावै, दिल में दर्द न आई,
    आतमराम पलक में दिन से, रुधिर की नदी बहाई।
    आज हिंदू धर्म में वही जातिवाद और भेदभाव का दानव विकराल होता जा रहा है, जिसके खिलाफ कबीर ने अकेले मोर्चा लिया था. भगवान को मंदिरों के बजाय मन में तलाशने का उपदेश दिया था। और भेदभाव खत्म करने का भी संदेश दिया. 
    गुप्त प्रगट है एकै दुधा, काको कहिए वामन- शुद्रा
    झूठो गर्व भूलो मति कोई, हिंदू तुरुक झूठ कुल दोई।।
    लेकिन कबीर के संदेश भी हिंदू कट्टपंथियों को कृपाण की तरह लगते हैं. राजनीति ने हिंदू-मुसलमान-सिक्ख-इसाई-बौद्ध सभी को सिर्फ दो हिस्सों में बांट दिया है. एक वो जो खुद को कट्टर हिंदू मानता है और एक जो इसका विरोधी है. जो हिंदू कट्टरपंथ का विरोधी है उसे हिंदूविरोधी कहा जाने लगा है. ऐसे में राजनीति की शब्गावली बदलने की ज़रूरत है. कबीर की सांप्रदायिक सौहार्द्र औऱ सर्वधर्म समभाव के संदेश को समझने की ज़रूरत है. कट्टरपंथ से लड़ाई लड़ने के लिए कबीर बनने की ज़रूरत है. औऱ कबीर की तरह ही हिंदू-तुर्क दोनों के कट्टरपंथ से लड़ने की बात करनी होगी. इसीलिए कबीर दोनों को एक साथ संदेश देते थे. वो कबीर ही थे जो पूछ सकते थे कि ना जाने तेरा साहब कैसा है,
    मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहब तेरा बहिरा है,
    पंडित होय के आसन मारे लंबी माला जपता है।
    अंतर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।
    कबीर कहते हैं कि हर दिल में एक कबीर है. वो कबीर है, वही सद्गुरु है, वही भगवान, राम, रहीम, रहमान तक ले जाता है. बस ज़रूरत है हर दिल में बसे कबीर को जगाने की..काश आज के नेता यह बात को समझ पाते.
     
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