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  • फिर वही ढाक के तीन पात, संसद में पारित हुआ भ्रष्टाचार निवारण(संशोधन) विधेयक, रिश्वत देने वाले को भी माना गाया भ्रष्टाचारी
  • July 25, 2018
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                                                             नाकाफी है भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) विधेयक,2013
     
    अंशुमान त्रिपाठी
     
    भ्रष्टाचार निवारण की दिशा में एक और कदम, लेकिन कानून की पहुंच से बाहर हैं असली अपराधी...
     भ्रष्टाचार निवारण(संशोधन) विधेयक संसद में पारित, रिश्वत देने वाले पर भी कसा जाएगा शिकंजा
     
    एक कदम आगे, चार कदम पीछे. जी हां, भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) विधेयक, 2013 लोकसभा में पारित कर दिया गया. इस संशोधन को सरकार भ्रष्टाचार निवारण की दिशा में एक अहम कदम मान रही है. भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने व ईमानदार कर्मचारियों को संरक्षण देने के साथ-साथ रिश्वत देने के आरोपियों को अधिकतम सात साल की सजा के प्रावधान वाले महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक को मंजूरी मिल गयी. राज्यसभा में भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया था.
    इस विधेयक में 1988 के मूल कानून को संशोधित करने का प्रावधान है. 
     
     
     
     
    भ्रष्टाचार निवारण संशोधन विधेयक 1988'' के कई प्रावधानों में संशोधन के लिए 19 अगस्त 2013 को राज्यसभा में यह विधेयक पेश किया गया था. तब राज्यसभा से इस विधेयक को छानबीन संबंधी संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया. फिर स्थायी समिति की रिपोर्ट मिलने पर इसे राज्यसभा की प्रवर समिति को सौंप दिया गया. साथ ही समीक्षा के लिए इसे विधि आयोग के पास भी भेजा गया था. इसके बाद प्रवर समिति ने 12 अगस्त 2016 को इस पर अपनी रिपोर्ट पेश की.
      सरकार का कहना है कि वर्तमान विधेयक में ईमानदार अधिकारियों के कोई भी अच्छे प्रयास बाधित नहीं हों, इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है . इसीलिए वर्तमान लोकसेवकों पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाने से पहले केंद्र के मामले में लोकपाल और राज्य से जुड़े मामले में लोकायुक्त की अनुमति को ज़रूरी माना गया है. सेवानिवृत्त लोकसेवकों को भी इस प्रावधान में शामिल किया गया है जिनके कार्यकाल में कोई भ्रष्टाचार का मामला सामने आया हो.
     साथ ही विधेयक में रिश्वत लेने वाले के लिए न्यूनतम तीन साल और अधिकतम सात साल की सजा का प्रावधान किया गया है. अब तक सरकारी कर्मचारियों पर रिश्वत लेने का आरोप तय होने के बाद 6 महीने से लेकर 5 साल तक की जेल की सजा दिए जाने का प्रावधान था.
    अब तक कानून के मुताबिक रिश्वत लेना ही अपराध माना जाता था, लेकिन अब रिश्वत देना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है. अपने लाभ या अप्रत्यक्ष रूप से काम को प्रभावित करने के लिए रिश्वत देने के आरोपी पर 3 से लेकर 7 साल तक जेल और जुर्माना लगाया जा सकेगा. इसके साथ ही रिश्व्त देने के लिए मजबूर किए जाने वाले व्यगक्ति को अधिकारियों को सात दिन के भीतर सूचना देने की स्थिति में इस कानून के दायरे से मुक्तो रखने का भी प्रावधान संशोधन में शामिल किया गया है. विशेष परिस्थितियों में ये समय सीमा पंद्रह दिन तक बढञाई जा सकती है. इसके अलावा नए संशोधन के तहत अब किसी बिचौलिए या तीसरे पक्ष के जरिए रिश्वत या लाभ लेना भी अपराध माना जाएगा और दोषी को सजा दी जाएगी.
     भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) धिनियम,2013 के ये प्रावधान सराहनीय है. सराहनीय इस लिहाज़ से भी कि इसके पूर्व भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत  पूर्व लोकसेवकों के खिलाफ भी अनुमति बगैर कार्रवाई का प्रावधान था. साथ ही रिश्वत के अलावा अन्य प्रकार के लाभ को भी रिश्वत लेने के बराबर माना जाता था. पिछली सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से लोकसेवक किसी भी प्रकार के निर्णय लेने में इतना भयभीत रहे कि सरकार पंगुता की शिकार हो गई, जिसे पॉलिसी पैरालिसिस कहा गया. एक नज़रिए से ये संशोधन ठीक हुआ, लेकिन वहीं दूसरे नज़रिए से एक बार फिर नौकरशाही को संदेह का लाभ मिल गया. आशंका जताई जा रही है कि अधिकारियों को मिले असीमित अधिकारों का दुरुपयोग संभव है. और ऐसे में भ्रष्चाचार निवारण का मूल उद्येश्य ही निरर्थक हो जाएगा. नौकरशाही फिर हावी हो जाएगी.
         सरकार का सबसे सराहनीय कदम रिश्वत देने वाले को भी भ्रष्टाचार निवारण कानून के दायरे में लाना है. इससे पहले ये ज़िम्मेदारी इकतरफा थी. सिर्फ लोकसेवकों को ही भ्रष्टाचार का जिम्मेवार माना जाता था. अब रिश्वत देने वाला भी उतना ही ज़िम्मेदार माना जाएगा जितना लेनेवाला. यही नहीं, उकसाने वाला तीसरे पक्ष के खिलाफ भी कार्यवाही की जाएगी.
    लेकिन सिर्फ रिश्वत देने वाले को ज़िम्मेवार मानना नाकाफी है. जब तक रिश्वत देने वाले व्यावसायिक संस्थान और उसके मुखिया को भी भ्रष्टाचार के दायरे में ना लाया जाए. इसमें कानून की शिथिलता साफ नज़र आ रही है. प्रावधान के मुताबिक संस्थान या उसके मुखिया को तब तक भ्रष्टाचार का ज़िम्मेवार नहीं माना जा सकता जब तक इस बात के सुबूत ना हासिल हो जाएं कि उसे इस कृत्य की जानकारी थी. ये एक ऐसा छिद्र है, जिसकी वजह से संस्थान या उसका मुखिया खुद बेदाग रहकर अपने कर्मचारियों के जरिए रिश्वत दिलवा कर अपने व्यावसायिक हित साध सकता है. उसे जेल नहीं जाना पड़ेगा. इसलिए चेक जारी करने वाला, हस्ताक्षर करने वाला और कंपनी दोनों को जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए. इनके लिप्त पाए जाने वाले व्यावसायिक संगठनों पर सजा, जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए.
             इससे भी अहम बात ये है कि इस संशोधन में विदेशी कर्मचारी को रिश्वत देने के अपराध का प्रावधान शामिल नहीं किया गया है. यानि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विदेशी कर्मचारी अपने भारतीय कनिष्ठ अधिकारियों पर दबाव बना कर संस्था के हित साधने की साजिश करते हैं तो भी उन पर किसी भी प्रकारकी कार्रवाई संभव नहीं हो सकेगी.
             अगर सरकार वाकई भ्रष्टाचार या घूसखोरी को रोकने के लिए कटिबद्ध है तो सूचना देने वाले की सुरक्षा को सुनिश्चित करने का प्रावधान क्यों नहीं है. सूचना देने वाले की सुरक्षा का कानून अब भी लंबित पड़ा है. व्हिसलि ब्लोअर की सुरक्षा को लेकर सरकार  जब तक जदिम्मेदाराना रुख अख्तियार नहीं करती तब तक भ्रष्टाचार का खात्मा संभव नहीं है.
    और सबसे बड़ी बात ये है कि भ्रष्टाचार से पीड़ित पक्ष के लिए इस कानून में क्या है. भ्रष्टाचार पीड़ित को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है. उसके लिए किसी भी तरह के किसी मुआवज़े का प्रावधान नहीं किया गया है.
    कुल मिला कर इस मामले में दोनों तरफ के कर्मचारियों को पहले से ही जिम्मेदार मान लिया गया है और भ्रष्टाचार के अधिष्ठाता और निजी संस्थान को शुरू में ही क्लीन चिट दे दी गी है, जब तक कि उनके खिलाफ बड़े सुराग ना हासिल हो जाएं. ये बिल्कुल उसी तरह की स्थिति है जैसे  सड़क पर अपनी गाड़ी चला रहा सुविधासंपन्न वर्ग का व्यक्ति सड़क दुर्घटना के लिए अपने ड्रायवर से कुबूलनामा दिलवा देता है. देश में कानून की नज़र में कब तक सभी नागरिक एक बराबर नहीं होंगे. कब तक दोहरा रवैय्या रखा जएगा. 
    सरकार का भ्रष्टाचार निवारण का संकल्प तब तक एक ढकोसला माना जाएगा जब तक कि वो लोकपाल की नियुक्ति नहीं करती. चार साल बीत जाने के बाद भी लोकपाल नहीं बना. कोई भी सरकार, केंद्र या राज्य, दोनों कोलपाल या लोकायुक्त की नियुक्ति को ज्यादा से ज्यादा टालने या वहां अपने किसी चहेते को बिठाने की कोशिश में रहती है.
    वहीं इस कानून के दुरुपयोग की भी पूरी संभावना नज़र आ रही है. कई एंजेन्सियों में एक साथ केस दर्ज होने से आरोपी का शोषण संभव है. ऐसा राजनीति से प्रेरित हो कर भी किया जाना संभव है.
     भ्रष्टाचार दरसल राजनीति और व्यवसाय के बीच अंतर्संबंधों का प्रतीक है. आजकल पैसा कमाने के लिए राजनीति और राजनीति के जरिए भ्रष्टाचार किया जा रहा है. हर चुनाव के लिए करोड़ों रुपए चाहिए. इसके लिए घूसखोरी, दलाली जरूरी हो गई है. पैसा आने पर पार्टी का टिकट खरीदा जाता है. सांसद-विधायक बनने पर नौकरशाही की मदद से पैसा कमाया जाता है. नौकरशाह भ्रष्टाचार का एक तंत्र विकसित करके देता है. बदले में वो अपनी कानून सुरक्षा सुनिश्चित करवाना चाहता है. राजनीतिक और लोकसेवक दोनों को आम जनता से कोई लेना-देना नहीं. ये एक संगठित अपराध है, संगठित आर्थिक अपराधों पर अंकुश लगाना जरूरी है. इसके लिए एनएन वोहरा कमेटी की रिपोर्ट पर भी अमल ज़रूरी है. प्रशासनिक, न्यायिक सुधार के साथ आर्थिक सुधार भी आवश्यक है. वहीं कानूनी तंत्र ऐसा है कि लोगों को न्याय पाने में सालों लगते हैं. कहां तक लड़ेगा कोई ईमान की लड़ाई. सारी की सारी सरकारी मशीनरी निहित स्वार्थ का शिकार है. इसी सिलसिले में शिकायत निपटान और सेवा संबंधी विधेयक भी लंबित है. 
     भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक द्रढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है. क्योंकि प्रशासनिक, राजनैतिक, आर्थिक, विधायी, न्यायिक, और सामाजिक स्तर पर बड़े बदलाव ज़रूरी है. सिर्फ एक पक्ष में सुधार से पूरी व्यवस्था सुधरने वाली नहीं है. लेकिन कुछ  ना होने से तो बदलाव की दिशा में एक भी कदम बेहतर है.
     
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