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  • नोटबंदी के बाद बैंकों के खातों में आई 99 फीसदी से ज्यादा रकम,बड़ा सवाल-कहीं नोटबंदी के पंख लगा कर हवा में उड़ तो नहीं गया काला धन
  • August 30, 2018
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                                           कालेधन पर लगाम लगाने में नाकाम रही नोटबंदी
        अंशुमान त्रिपाठी
      
                          रिजर्व बैंक ने 2017-18 की अपनी सालाना रिपोर्ट में जानकारी दी है कि 15 लाख 44 हज़ार करोड़ में से 15 लाख 31 हज़ार करोड़ रुपए वापिस आ गए हैं. आरबीआई को केवल 13 हज़ार करोड़ रुपए का हिसाब नहीं मिल पाया. यानि बंद किए गए नोटों में से 99.3 फीसदी नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं. 21 महीने लगाकर बैंकों में वापस आए पुराने नोटों की गिनती पूरी होने के बाद ये साफ हो गया है कि देश में कालाधन सिर्फ 0.7 फीसदी ही था, या फिर कालेधन वालों ने सांठगांठ कर अपने कालेधन को सफेद कर लिया?
                         सच्चाई किसी से छिपी नहीं है. पहले से मौजूद काले धन को सफेद करने का जरिया बन गई नोटबंदी. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व मंत्री और पत्रकार अरुण शौरी ने नोटबंदी को भारत के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला कहा था. सरकार के इस कदम से ना सिर्फ करीब सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी बल्कि पूरे देश की अर्थ व्यवस्था तहस नहस हो गई.
                    अब सरकार नोटबंदी को जायज़ ठहराने के लिए बचकानी दलीलें तलाश रही है. कहा जा रहा है कि अब पहले से ज्यादा पैसे सिस्टम में आ गए हैं और ये भी बताना पड़ रहा है कि ये नोट कहां से और कैसे आए. दावा किया जा रहा है कि दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी.
                      8 नवंबर, 2016 की रात, आठ बजे प्रधानमंत्री ने अपने टीवी संदेश में पांच सौ और हजार के नोट बैन करने का ऐलान किया था. तब बताया गया था कि काले धन को बाहर निकालने, आतंकवाद की कमर तोड़ने, जाली मुद्रा के चलन को बंद करने,डिजिटल लेन-देन और नकदी रहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के मकसद से ये कदम उठाया गया है. तब पुराने नोट बदलने के लिए 50 दिन का समय दिया गया था. शुरुआत में एटीएम से 2000 रुपये ही निकालने की सीमा थी जिसे बढ़ाकर बाद में 4000 कर दिया गया था. नोटबंदी के दौरान बैंकों के बाहर पुराने नोट बदलवाने के लिए लंबी लंबी कतारें देखी गईं. जिनमें ज्यादातर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को तकलीफ उठानी पड़ी. साधनसंपन्न वर्ग बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की राशि को नए दो हज़ार के नोटों में तब्दील करवाने में कामयाब रहा.
                     21 महीने तक नोटों की गिनती के बाद, जारी हुई रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट से साफ है कि  नोटबंदी में जितनी पुरानी करेंसी बाजार से बाहर हुई, उससे ज्यादा अब चलन में आ चुकी है। आरबीआई के मुताबिक मार्च 2018 तक 18.03 लाख करोड़ रुपए चलन में आ चुके हैं। बीते एक साल के दौरान इस करेंसी में 37.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। आरबीआई ने कहा है कि मार्च 2017 तक जितनी करेंसी चलन में थी उसमें 72.7 फीसदी 500 और 2000 के नोट में थी। लेकिन मार्च 2018 तक यह 80.2 फीसदी हो गई।
    इस रिपोर्ट से साफ है कि नोटबंदी काला धन तलाशने में नाकाम रही. यहां तक कि हाल के दिनों में जारी आतंकी वारदातों से साफ है कि नोटबंदी से आतंकवाद की कमर तोड़ने में भी कामयाबी नहीं मिल पाई. वहीं जाली करंसी का चलन नए नोट आने के बाद तेज़ी से बढ़ा है. नोटों की पहचान की दिक्कत की वजह से रोज़मर्रा के लेनदेन पर असर पड़ रहा है. नोटबंदी से न तो नकली नोट पकड़े गए और न ही डिजिटल लेन-देन बढ़ा। कालाधन तो सिस्टम में आकर सफेद हो गया। रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट का लब्बोलुबाब ये है कि नोटबंदी के लिए केंद्र सरकार के सारे तर्क धराशाई हो गए हैं। रिजर्व बैंक ने कहा है कि 8 नवंबर 2016 को जितनी नकदी चलन में उससे ज्यादा नकदी अब चलन में है। 
    सवाल ये भी है कि क्या वाकई काला धन और जाली नोट बाज़ार में नहीं थे, जैसा रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट से पता चल रहा है. और अगर ये काली और नकली मुद्रा थी तो आखिर गईं कहां, कहीं नोटबंदी इन्हें अर्थव्यवस्था में खपाने का जरिया तो नहीं बन गई. रिज़र्व बैंक ने ने जाली नोटों पर भी आंकड़े जारी किए हैं। आरबीआई ने बताया है कि 2017-18 में 5,22,783 नोट, 2016-17 में 7,62,072 नोट और 2015-16 में 6,32,926 नोट पकड़ में आए थे। यानी जाली नोटों का धंधा अब भी जारी है और धीरे-धीरे बढ़ रहा है.
             इतना ही नहीं, इससे बड़ी चिंता का विषय ये है कि जो जाली नोट पकड़ में आ रहे हैं उनमें 100 और 50 रूपए मूल्य के नोट भी शामिल हैं, और इनमें क्रमश: 35 फीसदी और 154.3 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। साथ ही नई सीरीज के 500 और 2000 के जाली नोट भी सामने आए हैं। पिछले साल की तुलना में 100 रुपये के जाली नोट 35 प्रतिशत अधिक पकड़े गए जबकि 50 रुपए के नकली नोट तो 154 फीसदी बढ़ गए हैं. 
          पूरा मामला पानी की तरह साफ हो चुका है. नोटबंदी कालेधन को सफेद करने का जरिया बनी है. इसमें सरकारी और सहकारी बैंकों की भूमिका संदिग्ध रही है. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक एक लाख या उससे अधिक के जितने भी घोटाले हुए हैं, उनमें से 92.9 फीसदी सरकारी बैंकों में और 6 फीसदी निजी बैंकों में हुए हैं। ऐसे मामले जिनमें बहुत अधिक पुराने नोट जमा कराए गए, अब आयकर विभाग की जांच के घेरे में हैं. बताया जा रहा है कि आयकर विभाग के पास इतने संसाधन उपलब्ध नहीं हैं कि वो इन मामलों पर संज्ञान ले सके, लिहाज़ा कठुआ चाल से कार्रवाई चल रही है.
           लेकिन कालेधन को रोकने की मंशा पर सवाल दो हज़ार के नोट छापने को लेकर खड़े हो रहे हैं. सरकार ने 500 रुपये के बंद नोट के स्थान पर नया नोट तो जारी किया है लेकिन 1,000 रुपये के नोट के स्थान पर नया नोट जारी नहीं किया गया है. इसके स्थान पर 2,000 रुपये का नया नोट जारी किया गया है. दो हज़ार का नोट कालेधन की जमाखोरी के लिए पहले के हज़ार और पांच सौ रुपए के नोटों के मुकाबले ज्यादा आसान है. नए नोटों की छपाई में भी दोगुना खर्च करना पड़ा. नोटबंदी के बाद 2016-17 में रिजर्व बैंक ने 500 और 2,000 रुपये के नए नोट तथा अन्य मूल्य के नोटों की छपाई पर 7,965 करोड़ रुपये खर्च किए, जो इससे पिछले साल खर्च की गई 3,421 करोड़ रुपये की राशि के दोगुने से भी अधिक है. 2017-18 (जुलाई 2017 से जून 2018) के दौरान केंद्रीय बैंक ने नोटों की छपाई पर 4,912 करोड़ रुपये और खर्च किए.
     असलियत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नोटबंदी आजादी के बाद की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुई है. ग्रामीण और कृषि क्षेत्र पर नोटबंदी का सबसे दर्दनाक असर पड़ा है. किसान वक्त पर अपनी फसल की बुआई, बीज-खाद-सिंचाई की व्यवस्था करने के लिए पैसे-पैसे के लिए तरस गया है. तो बेटियों के विवाह टूट गए हैं. वहीं असंगठित क्षेत्र के खेतिहर मजदूर और शहरी क्षेत्र में काम कर रहे मजदूर दाने-दाने को तरस गए हैं. बड़ी तादाद में लघु उद्योग-धंधे बंद हो चुके हैं और मजदूर वापस अपने गांव लौट चुके हैं, ताकि किसी तरह गुजर-बसर हो सके. लेकिन गांव में ना तो खेती बच सकी है ना ही दस्तकारी या दूसरे रोज़गार.
     वहीं, नोटबंदी से बड़े से बड़े उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को कम से कम नुकसान हुआ है. उनके पक्ष में दलील दी जा रही है कि वो पहले से ही सारा काम सफेद लक्ष्मी से करते हैं, उन्हें चरित्र प्रमाणपत्र देने वाले जानते हैं कि दरसल काला धन घरों, फैक्ट्रियों या बैंकों के अवैध खातों में अब नहीं रखा जाता है, बल्कि पी नोट्स और दूसरे साधनों के जरिए टैक्स हैवन्स के विदेशी खातों में पहुंचा दिया जाता है.
    बहरहाल नोटबंदी के नाटक का पटाक्षेप हो चुका है. आम लोग नए सिरे से जिंदगी का तिनका-तिनका समेट रहे हैं.
     
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