ads

adss

adsss

adsss

  • महत्वाकांक्षी मुद्रा योजना बन सकती है बड़े एनपीए की वजह,किए जा रहे हैं बदलाव
  • September 13, 2018
  •   

              मुसीबत बन रही है महत्वाकांक्षी मुद्रा योजना

    अंशुमान त्रिपाठी-

            हाल ही में संसदीय समिति के सामने पेश हुए रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी मुद्रा योजना समेत दूसरी कर्ज लक्ष्य वाली योजनाओं को भावी खतरा बताया. रघुराम राजन ने पिछली सरकार को भी देश में बढ़ते एनपीए यानि गैर-निष्पादित संपत्ति के लिए ज़िम्मेदार बताया. राजन का कहना है कि मुद्रा जैसी योजनाएं से एनपीए बढ़ने की आशंका है. उन्होंने मुद्रा लोन, किसान क्रेडिट, एमएसएमई क्रेडिट गारंटी जैसी योजनाओं को एनपीए बढ़ाने वाले नए स्रोतों के रूप में बताया. रघुराम राजन ने कहा, '''' सरकार को अगले संकट के लिए जिम्मेदार हो सकने वाले स्रोतों पर भी ध्यान देना चाहिए. खासकर सरकार को महत्वाकांक्षी कर्ज लक्ष्य या कर्जमाफी से बचना चाहिए.'''' 

       राजन ने चेतावनी देते हुए कहा, ''''मुद्रा लोन और किसान क्रेडिट कार्ड लोकप्रिय तो हैं, लेकिन इनसे कर्ज जोखिम बढ़ने की संभावना को देखते हुए इनका गहनता से परीक्षण करना होगा. इसी तरह, सेबी द्वारा चलाई जा रही एमएसएमई क्रेडिट गारंटी स्कीम (CGTMSE) में भी देनदारी बढ़ रही है और इन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.''''  

           गौरतलब है कि पीएम मोदी और एनडीए सरकार मुद्रा लोन जैसी योजना को रोजगार सृजन के बड़े प्रेरक के रूप में देखती है.

            दरसल मुद्रा यानी माइक्रो यूनिट्स डेवेलपमेंट एंड रीफाइनेंस एजेंसीको मोदी सरकार ने 2015 में लॉन्च किया था. जिसका उद्देश्य आर्थिक किल्लत वाले छोटे कारोबारियों को कर्ज दिलाना था.  

          अपने कार्यकाल के 4 साल पूरे होने के बाद मोदी सरकार मुद्रा योजना को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त है. सरकार को ये योजना राजनीतिक लाभ देने वाली नज़र आ रही है.  दरसल रोजगार स्रजन में कामयाबी ना मिलने पर सरकार मुद्रा योजना, एमएसएमई की क्रेडिट गारंटी स्कीम को रोजगार के विकल्प के रूप में पेश करने को मजबूर हो गई है. सरकार ने इसीलिए रोजगार के आंकड़े तक जारी नहीं किए है.

                  अगर जारी किए हुए कर्ज का विश्लेषण देखा जाए तो मुद्रा योजना की स्वरोजगार की प्रेरक योजना के रूप में बहुत अच्छी स्थिति नहीं है. जबकि प्रधानमंत्री लालकिले के प्राचीर से इस साल पंद्रह अगस्त को रोजगार के बदलते हुए रूप का हवाला दे कर अपनी सरकार की पीठ थपथपाते हैं. तीन साल में लगभग तेरह करोड़ कर्ज दिए जा चुके हैं, जिसमें दावा है कि चार करोड़ कर्ज तो नए व्यवसाय शुरू करने के लिए दिए गए है. प्रधानमंत्री हाल के दिनों में कई अन्य मंचों से भी मुद्रा योजना को लगातार सफल बताते रहे हैं।

              गौरतलब है कि हालिया आंकड़ों के मुताबिक मुद्रा लोन का एनपीए अब 14 हजार 358 करोड़ का हो चुका है, यानी इस लोन को चुकाए जाने की संभावना बहुत कम है. एनपीए को रोकने में लगे वित्त मंत्रालय और बैंकों के सामने रणनीति को लेकर चुनौती है। इस मामले में बैंकों ने सरकार और आरबीआई को साफ तौर पर बता दिया है कि मुद्रा लोन में एनपीए और बढ़ सकता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मुद्रा स्कीम में अब तक 12 करोड़ 78 लाख लोगों को लोन दिया जा चुका है। ये लोन शिशु, किशोर और तरुण, तीन अलग अलग कैटिगरी के तहत दिए गए। शिशु कैटिगरी में 50 हजार रुपये तक, किशोर में 5 लाख रुपये तक और तरुण में 5 लाख से 10 लाख रुपये तक के लोन दिए जाते हैं।

           वहीं किशोर कैटिगरी में अब तक कर्ज पाने वालों की तादाद सिर्फ 1.3 फीसदी है, यानी कि 12 करोड़ 78 लाख लोगों में से सिर्फ 17 लाख 57 हजार लोगों को ही मोटी रकम का लोन मिला है. इसका मतलब है कि मुद्रा लोन लेकर कारोबार शुरू करने वालों की संख्या काफी कम है. वहीं 12.78 करोड़ ऋणों में से 90%  से ज्यादा शिशुश्रेणी में बांटे गए यानी 50,000 रुपये या इससे नीचे की राशि के.  जाहिर है कि इस तरह के कर्ज कभी भी ठोस रोजगार का विकल्प नहीं बन सकते हैं.

              सरकार के आकड़ों के मुताबिक मुद्रा योजना के 12 करोड़ लाभार्थियों में से 28 फीसदी तकरीबन 3.25 करोड़ लोग पहली बार उद्यमी बने थे. वहीं 74 फीसदी तकरीबन 9 करोड़ लाभार्थी महिलाएं थीं और 55 फीसदी लाभार्थी एससी/एसटी और दूसरी पिछड़ी जातियों से थे. ये गणित वोटों के लिए खासा लुभावना भी है.

            किंतु अर्थशास्त्रियों की चिंता दूसरी है. रघुराम राजन देख रहे हैं कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में एमएसएमई को दिए गए कर्ज के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2014 से मार्च 2018 के बीच कर्ज में -2 फीसदी की निगेटिव ग्रोथ दर्ज हुई है. जाहिर है कि कर्जवापसी में खासी गिरावट है.और  ऐसे में ऐसी लोकलुभावन योजनाऐं सरकार के गले की फांस बन सकती हैं.

     ऐसे में सरकार ने एक प्रस्ताव तैयार किया है जिसके तहत कुशल श्रमिकों को ही मुद्रा लोन का लाभ दिया जाएगा। प्रस्ताव के मुताबिक मुद्रा लोन की पात्रता में बदलाव करके केवल उन्हीं लोगों को लोन का फायदा दिया जाए, जिनके पास स्किल ट्रेनिंग सर्टिफिकेट हो।

     

    सरकार ने एक तीर से दो निशाने साधते हुए मुद्रा लोन का एनपीए कम करने और स्किल ट्रेनिंग पा चुके युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए एक नया प्रस्ताव पेश किया है। सरकार की योजना है कि इस नए प्रस्ताव से कुशल श्रमिकों को कर्ज दे कर देश में रोजगार की स्थिति में सुधार किया जा सकता है। कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक अगर किसी स्किल वर्कर को जॉब नहीं मिलती है, तो वह अपना बिजनेस सेटअप खड़ा कर सकता है। इससे न केवल वह अपना बिजनेस खड़ा कर पाएगा, बल्कि वह दूसरों को भी रोजगार मुहैया करने में मदद करेगा।

     स्किल डेवलपमेंट स्कीम सरकार के लिए दूसरी समस्या है. अब तक तेरह लाख से ज्यादा युवाओं को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा चुका है और चार लाख से ज्यादा का सर्टिफिकेशन किया जा चुका है, लेकिन उन्हें अब तक रोजगार नसीब नहीं हो पाया है. ऐसे में कौशल विकास योजना के तहतप्रशिक्षित युवाओं को मुद्रा योजना का लाभार्थी बनाया जाएगा

     हालांकि अर्थशास्त्रियों की नज़र से हट कर सामाजिक अर्थशास्त्र की नज़र से देखा जाए तो देश का कॉर्पोरेट जगत कुल एक करोड़ 25 लाख रोजगार स्रजित करता है, वहीं एमएसएमई तेरह करोड़ लोगों को रोजगार देता है. ऐसे में संसाधनों के समान वितरण के नजरिए से देखा जाए या कर्ज के जोखिम की नज़र से देखें तो बड़े कर्ज में वापसी का जोखिम ज्यादा रहता है तो छोटे कर्ज में वसूली की संभावना अधिक रहती है. ऐसे में सरकार को योजनाओं पर गंभीर चिंतन-मनन के बाद उसकी व्याव्हारिकता के मद्देनज़र रूप-स्वरूप दिया जाना चाहिए. लोकलुभावन ना सही लेकिन विकास की संभावनाओं के दरवाजे संसाधन रहित लोगों के लिए भी खुले रखना किसी भी लोकतंत्र के लिए बेहद ज़रूरी है. इश योजना के तहत महिला स्व-सहायता समूहों में से कर्ज लेने वाले ज़रूरतमंद और व्यवसाय को स्थापित करने की ऊर्जा से लबालब रहती हैं. इसलिए इस योजना में हल्के-फुल्के बदलाव कर इसे बढ़ाया जा सकता है। 

  • Post a comment
  •       
Copyright © 2014 News Portal . All rights reserved
Designed & Hosted by: no amg Chaupal India
Sign Up For Our Newsletter
ads