• स्वच्छ भारत मिशन बनता जा रहा है कागज़ी अभियान, आंकड़ों से ढकी जा रही है भ्रष्टाचार और लापरवाही की गंदगी
  • October 02, 2018
  •                                                  स्वच्छ भारत मिशन बनती जा रही है कागज़ी योजना

          अंशुमान त्रिपाठी
     
               संभवतया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ये अभियान उनकी लोकप्रियता को बढ़ाने में सबसे कारगर हथियार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 145वें जयंती पर  ''''स्वच्छ भारत अभियान'''' की शुरुआत की. इस मौके पर उन्होंने कहा कि बापू के लिए स्वच्छ भारत से बढ़ कर सच्ची श्रद्दांजलि औऱ क्या हो सकती है. निस्संदेह तब प्रधानमंत्री मोदी नवोत्साह से भरपूर थे और सबसे रचनात्मक आंदोलन की बुनियाद रखी. इसमें भी कोई संदेह नहीं कि कृषिप्रधान देश होने के कारण खुले में शौच एक साधारण जीवन का हिस्सा रहा है. स्वच्छता की बात महात्मा गांधी ने कही लेकिन स्वाधीनता आंदोलन के शोर में बहुत बड़े तबके के कानों तक नहीं पहुंच सकी. नरेंद्र मोदी को इश बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने स्वच्छता को सामाजिक बदलाव  का एक हथियार बनाया. 
           उन्होंने खुद दिल्ली मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के पास झाड़ू लगाकर सफाई अभियान की शुरुआत की. उन्होंने ''''ना गंदगी करेंगे, ना करने देंगे'''' का नारा भी दिया.  उन्होंने एक व्यक्ति से दूसरे को जोड़ कर अभियान को आगे बढ़ाने की योजना शुरू की. प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर पूरा देश जुट गया. बड़े बड़े नामवर लोग झाड़ू लगाते हुए सेल्फी खिंचवाने में जुट गए. धीरे-धीरे ये सेल्फी आंदोलन बन कर रह ये राजनीति की वजह से गंदगी कभी कम ना हो सकी. नगर निगम राज्य सरकार पर और राज्य केंद्र पर दोष मढ़ता रहा. वहीं राज्यों में हालत और बदतर ही रही.
    स्वच्छ भारत मिशन के पोर्टल में तेज़ी से आंकड़ें बदल रहे हैं, लेकिन देश की सूरत नहीं बदल पा रही है. स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण में भ्रष्टाचार ने गंदगी को भी पीछे छोड़ दिया है. रिश्वत के बगैर सरकारी मदद लोगों तक पहुंच नहीं पा रही है. बिहार में 15 करोड़ रुपए के घपले की बात सामने आई है.कहीं लोगों से पैसे ले कर कहीं और खर्च किए जा रहे हैं तो कहीं लोगों को कागज़ पर लाभार्थी दिखा कर पैसे सरकार से लिए जा रहे हैं. लोगों के पास जानकारी और साधनों की कमी है. लेकिन सरकार भी पीछे नहीं है. पिछले साल स्वच्छता मिशन के लिए सेस बंद कर दिए जाने के बावजूद इस साल तक लोगों से पैसे वसूल किए जा रहे हैं. अब तक हज़ारों करोड़ रुपए इस मद में इकट्ठे किए जा चुके हैं. इनका कहां इस्तेंमाल हो रहा है, इसका खुलासा नहीं किया गया है. खुले में शौच जाने पर अतिउत्साही सरकारी कारिंदों ने महिलाओं तक की तस्वीरें खींचने से परहेज नहीं किया. कई जगह हिंदू-मुस्लिम तो कई जगह निजी रंजिशों को भुनाने में इस फरमान का इस्तेमाल किया गया. इस वर्ष जनवरी तक गोवा, बिहार औऱ मणिपुर को खुले में शौच से मुक्त राज्य नहीं बनाया जा सका. अब तक कुल 36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में से महज 17 राज्य ही खुले में शौच से मुक्त घोषित हो सके हैं.
    सबसे बड़ी बात ये है कि जिन सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण हुआ, उनमें से बहुत से शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं की जा सकी. ना ही रखरखाव के लिए किसी की नियुक्ति की गई. लिहाज़ा कहीं टोटिंयां उखाड़ ली गईं तो कहीं लगाई ही नहीं गईं. जिस अंधाधुंध तरीके से शौचालय बनाए गए, उतनी ही तेज़ी से वो बेकार होते चले गए. भारतीय महालेखाकार यानि सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों मे भी पाइप वाले पानी की व्यवस्था के अभाव में शौचालय गोदाम या दुकान में तब्दील कर दिए गए.हालांकि जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2017 में ही सरकार ने तकरीबन 570 करोड़ रुपए विज्ञापन में खर्च कर दिए थे. विश्व बैंक ने पूरी योजना को विफल बताते हुए अगली किश्त रोक दी है. ग्रामीणविकास से जुड़ी लोकसभा की एक समिति ने स्वच्छ भारत मिशन को कागज़ी बताया है.
    स्वच्छ पेय जल भी स्वच्छ भारत मिशन का ही हिस्सा है. लेकिन सरकार ने इस पर सबसे कम ध्यान दिया है. इतना ही नहीं स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की योजना पर राशि का आवंटन केंद्र सरकार ने कम कर दिया है. जिस तरह से शौचालयों की संख्या बढ़ा कर खुले में शौच से मुक्त शहर घोषित करने की होड़ लगी ही है, ऐसी ही होड़ की ज़रूरत पेयजल की स्वच्छता निर्धारित करने की है. किस शहर का पेयजल कितना प्रदूषित है, इसके लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया है. हलांकि लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ने विश्व स्वास्थ्य्य संगठन की रिपोर्ट के हवाले से अपनी ही पीठ थपथपाई थी. उन्होंने कहा था डब्ल्यूएचओ ने माना है कि उनके स्वच्छता अभियान चलाने से देश में करीब तीन लाख बच्चों की जान बच गई जो प्रदूषित जल से होने वाली बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. हालांकि रिपोर्ट में इस बात का कहीं जिक्र नहीं था सिवाय स्वच्छता मिशन की सराहना के.
       गुजरात की स्थिति और भी खराब है. आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार वहां जरूरत भर के शौचालय नहीं बन पाए हैं. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वहां सिर्फ तीस फीसदी घरों में ही शौचालय बन सके हैं. बल्कि आकंड़ों की बाज़ीगरी की जा रही है. आकंड़ों की ऐसी बाज़ीगरी उत्तर प्रदेश में दिखाने की कोशिश की गई..
    यही नहीं स्वच्छता में अव्वल आने की अंधी दौड़ में इंदौर में तो एक झोपड़बस्ती को ही उजाड़ दिया गया. जबकि उस बस्ती के लोगों ने नगरनिगम के पास शौचालय बनाने के लिए पैसे भी जमा करा दिए थे.
     स्वच्छ भारत मिशन बगैर स्वच्छता कर्मियों के कल्याण के बगैर अधूरा है. आज भी हालात ये है कि हर दो हफ्तों में तीन सफाई कर्मचारी गटर में काम करते हुए अपनी जान दे देते हैं. एक गैर सरकारी संगठन के मुताबिक 1993 से अब तक करीब 1,760 सफाई कर्मचारी इसी तरह अपनी जान दे चुके हैं. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से देश भर के इस तरह मारे गए सफाईकर्मियों की पहचान कर प्रत्येक के परिवार को दस-दस लाख का मुआवज़ा दिया जाए. लेकिन विडंबना ये है कि आज तक इन सफाई कर्मचारियों की पहचान ही नहों हो पाई. राज्यों से अभी तक जानकारियां मंगाई ही जा रही हैं. यहां ये बताना ज़रूरी होगा कि  मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर में भेजने पर पूरी तरह से रोक है. अगर किसी विषम परिस्थति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजा जाता है तो इसके लिए 27 तरह के नियमों का पालन करना होता है. जिनमें से प्रमुख है- सीवर में अंदर घुसने के लिए इंजीनियर की इजाजत, साथ ही पास में ही एंबुलेंस की व्यवस्था ताकि दुर्घटना की स्थिति में जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके.इसके साथ सीवर टैंक की सफाई के दौरान विशेष सूट, ऑक्सीजन सिलेंडर, मास्क, गम शूज, सेफ्टी बेल्ट व आपातकाल की अवस्था के लिए एंबुलेंस को पहले सूचित करने जैसे कड़े नियम है.लेकिन सच्चाई यही है कि सरकारी और निजी एजेंसियां इन नियमों की सरासर अनदेखी करती आ रही हैं और महात्मा गांधी के इन हरि के ये जन फिर किसी गांधी के अवतार का इंतेज़ार कर रहे हैं
     
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