• गरीबी की वजह से नवजात बेटी बेच कर झारखंड में एक मां ने तो़ड़ा दम, मुख्यमंत्री का दावा- गरीबी से जल्द मुक्त होगा राज्य
  • September 10, 2019
  •  विकास की आतिशबाज़ी से इन दिनों जगमग है झारखंड. दूसरी बार बीजेपी सरकार के नारा करने साकार चारों तरफ सज रही है झांकी विकास की...तमाम चैनल सरकारी पैसों की लूट के लिए शिखर सम्मेलन करने पहुंच रहे हैं. गोरे-चिकने चुपड़े चेहरे वाले ऐंकरों के साथ अबुआ मुख्यमंत्री रघुबर दास को देख पूरा दिसूम मस्त है. झमाझम कैमरे, बड़ी-बड़ी रोशनी और सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में पत्रकार बता रहे हैं कि सचमुच कितनी महान है आपकी सरकार. हर पोस्टर पर चमकते-मुस्कुराते चेहरे विकास की कहानी कहते हैं. लाउड स्पीकरों पर गरजते-लरजते विकास की लोकगीत और डीजे के धूम-धड़ाके के बीच गुमला शहर से दो किलोमीटर दूर झिबेल आखिरी सांस लेती है औऱ दम तोड़ देती है. इस शोर-शराबे में भला कौन सुन सकता है उसकी आखिरी हिचकी. पुग्गू पंचायत के चंपानगर में गरीब-गुरबों के लिए ये कोई कहानी भी नहीं. मरते ही रहते हैं. सो झिबेल तिर्की भी मर गई. झिबेल ने चालीस की उमर में ही ज़िंदगी के सारे दुख-दर्द सह भी तो लिए थे. झारखंड के आदिवासी समाज की झिबेल इतनी सी उमर में आठ बच्चे जन चुकी थी. शहर की दुकान में मजदूरी कर पूरे परिवार का पेट पाल रही झिबेल आठवें बच्चे के वक्त डर सी गई. चरवा का रिक्शा बिगड़ गया था. सुधरवाने के लिए पैसे ना होने से कई दिनों से घर पर पड़ा था. गरीबी में घर पर पड़े-पड़े तबियत भी बिगड़ गई थी उसकी. कहने को पेट दर्द था, दरसल चरवा की हिम्मत भी ज़वाब दे गई थी, सो झिबेल भी आखिर कब तक सहती. बताते है बच्चा जनने से कुछ देर पहले तक वो मजूरी कर लौटी थी. दरद उठने के बाद भी चरवा के इंतज़ार में थी. वो अस्पताल जाने को तैयार नहीं हुई. तैयार क्या नहीं हुई, वो जानती थी कि उसे ले जाने के लिए पैसे नहीं है. चरवा लाता भी कहां से. कौन देता है आजकल. गुमला जिले में भी दूसरे जिलों की तरह अस्पतालों में मुरदा चिकित्सा व्यवस्था थी. जैसे जैसे दर्द बढ़ता रहा झिबेल को परिवार की फिक्र बढ़ती रही. वो कहती रही कि अस्पताल वाले पेट काट कर बच्चा निकालेंगे, जिससे वो लंबे वक्त तक मजूरी नहीं कर पाएगी. ज़ाहिर है कि उसकी सातों संतान, बूढ़ी सास और चरवा का पेट कैसे भरेगा तब तक. ऊपर से भारी बारिश. बार-बार अपने बच्चों से कराहती-कहती रही कि उसके बाद उनको कौन पालेगा. झिबेल के मना करने पर चरवा पास-पड़ोस से रिश्तेदारी की महिलाओं को ले आया. दस फुट की झोपड़ी में घर के ग्यारहवें सदस्य की अगवानी के लिए ज़मीन पर चादर बिछाई गई. झिबेल ने फिर एक नई दुनिया को जनम दिया. बहुत खून बह गया था, लेकिन मासूम लक्ष्मी आई थी तिर्की के घर. कर्ज, अनाज और इलाज़ के फिकर दूर करने के लिए. आते ही मां के दूध का कर्ज भी अदा कर दिया. जनम के कुछ घंटे बाद ही एक निसंतान दंपति ने उसे मांग लिया. इसे कानून की जुबान में बच्चा बेचना कहा जाता है. बदले में चरवा के इलाज, करज औऱ अनाज के लिए दस हज़ार रुपए दिए. गरीबी, बेबसी और लाचारी के गहरे समंदर में दस हज़ार रुपए अनाज,दवाई और कर्ज अदायगी में बंटते घंटों भी ना लगे. फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया. लेकिन झिबेल इस बार सदमा झेल ना सकी. सात बच्चों को कलेजे के टुकड़ों की तरह पाल-पोसने का कलेजा रखने वाली झिबेल आठवीं बच्ची को कलेजे से दूर करने का सदमा भूल ना पाई. पैसों ने घर में कुछ चहल-पहल रही, बच्चों की आवाजें सुनती रही.लेकिन एक गहरा सन्नाटा सा पसर गया था उसके अंदर. टूट गई उसकी जीने की ललक. खून बहुत बह जाने से जिस्म ने भी साथ देना बंद कर दिया. बिटिया के जन्म के 72 घंटे के भीतर झिबेल दुनिया को अलविदा कह गई. ना तो बच्चे की डिलेवरी के वक्त औऱ ना ही उसके अंतिम संस्कार के वक्त तिर्की परिवार के पास पैसे थे. आखिर गांव की औरतों ने चंदा जुटा कर झिबेल को आखिरी विदाई दी.झिबेल के साथ तिर्की परिवार की जैसे उम्मीद ही चली गई. उसके मरते ही चरवा ने फिर बिस्तर पकड़ लिया. अस्पताल में भरती है. चुनावी धूम-धड़ाके के बीच झिबेल का यूं ही खामोशी से चली तो गई, लेकिन गांव में बच्चा बेचने की बात आग की तरह शहर तक फैल गई. अब सरकारी अमला मामले की पड़ताल में जुट गया. झिबेल की बेटी को जब्त कर लिया गया. बयान के लिए चरवा के अस्पताल से आने का इंतजार है. अब सदर अस्पताल के डॉक्टर साब चरवा के इलाज़ के लिए फिक्रमंद हैं. उन्हें इस बात को लेकर खासी तकलीफ है कि चरवा ओंराव के परिवार का गोल्डन कॉर्ड नहीं बन पाया. वरना वो बेहतर से बेहतर इलाज़ करते. दरसल आय़ुश्मान कार्ड के लिए राशन कार्ड होना ज़रूरी है. सर्किल अफसर कहते हैं कि उन्होंने चरवा के घरवालों का राशनकार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. पहले की बात, पहले वाला जाने, ज़वाब मांगना है तो ब्लॉक सप्लाई अफसर से मांगों. झारखंड सरकार गरीबी की रेखा के नीचे जीने वाले बीपीएल परिवारों के लिए महीने में 35 किलो अनाज अंत्योदय अन्न योजना के तहत बांटती हैं. लेकिन चरवा ओंराव जैसे जानें कितने ही अशिक्षित-लाचार आदिवासी परिवार हैं. जहां विकास की रोशनी नहीं पहुंच पाती. शहरों में पेट्रोल पंपों पर लगे बड़े-बड़े होर्डिग्ज़ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चमकते चेहरे के साथ सिलेडर पर रोटी पकाती महिला तो दिखाई देती है, लेकिन उसका चेहरा झिबेल औऱ झिबेल जैसी कितनी ही ज़रूरतमंद महिलाओं से नहीं मिलता. जबकि झारखंड में उज्वला योजना के तहत 29 लाख सिलेंडरों को दोबारा भरने का दावा किया गया है. चरवा की मां भोदौं को सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी नहीं मिलती. सरकारी कारिंदों ने कागज़ातों में भोदौं की गलत उमर दर्ज कर उसे सरकारी इमदाद से महरूम बना दिया. प्रधानमंत्री आवास योजना. शौचालय योजना, दीनदयाल विद्युतीकरण योजना का फायदा तो दूर की बात है. लेकिन ये झिबेल ही थी. जिसने अपनी आखिरी हिचकी के जरिए बता दिया कि दिल्ली से आए ये दिक्कू आदिवासियों का हक मार उनके हिस्से के विकास के पैसे की लूट के लिए दिसूम आए हैं. चुनाव के करोड़ों के विज्ञापन ले कर सरकार का गुणगान कर रहे हैं. लेकिन इस चुनावी शोर से हक की आवाज़ दबने वाली नहीं है. 

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