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  • कोरोना को सियासत ने दिया नया नाम,बढ़ते मामलों से हटा कर ध्यान, तैयारियों को लेकर बेफिक्र सरकार
  • April 02, 2020
  •  बहुत खूनी होता है सत्ता का खेल...

    राम मंदिर की जगह अब कोरोना ने ले ली है....कोरोना को गोल टोपी पहना दी गई है...अब गोल टोपियों को कोरोना बताने की सियासत जारी है....

     

    कोरोना को लेकर हर आदमी खौफज़दा है. ऐसे में अगर किसी को ये मालूम हो कि उसके बीच में से कुछ लोग कोरोना प्रभावित हैं तो उनमें कितनी दहशत होगी, समझा जा सकता है. लेकिन गुजरात मॉडल का एक और अंदाज़ दिल्ली के हज़रत निज़ामुद्दीन के तब्लीगी जमात मरकज़ मामले में सामने आया. मरकज़ के कर्ता-धर्ता इसके जिम्मेदार थे. उनके खिलाफ कार्रवाई हुई, लेकिन इनको इतनी छूट मिलने के जिम्मेदार थे गृह-मंत्रालय, खुफिया विभाग औप दिल्ली पुलिस के आला अफसर, इनमे से किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई.

    असलियत तो ये है कि मरकज के खिलाफ भी कोई कार्रवाई नहीं होनी थी अगर कोरोना संक्रमण के मामलों में बढ़ोत्तरी नहीं होती. कई जगह पर डॉक्टरों ने सुरक्षा परिधानों औऱ उपकरणों के लिए अपना रुख कड़ा नहीं किया होता. 

    लेकिन तब्लीग से जुड़े कोरोना संक्रमण के मामले तमिलनाडु, असम, कर्नाटक,महाराष्ट्र औऱ प.बंगाल से सामने आने लगे तो इस लापरवाही की ज़िम्मेदारी का ठीकरा मरकज़ पर फोड़ने की सियासत तेज़ हो गई.

    दिल्ली पुलिस भी तक ये साफ जवाब नहीं दे पा रही है कि मरकज़ प्रशासन ने जब 17 बसों के लिए पास जारी करने की अर्जी दी थी तो उसका क्या हुआ. जब सरकार तानाशाह होती है तो पुलिस भी उसके समर्थक और विरोधियों से अलग-अलग तरह का बर्ताव करती है. औऱ ये दिल्ली के दंगों के दौरान साफ तौर पर देखा गया  है. खुद दिल्ली पुलिस सत्ताधारी पार्टी के गौरक्षक दल से बहुत अलग बर्ताव नहीं कर रही थी. हैरानी की बात यही है कि जिस दिल्ली पुलिस के आला अफसरों की नियुक्ति में पचासों करोड़ की घूस के लेनदेन के आरोप बरसों से लगते रहे हैं हैं. वो अपने निवेश से मुनाफा कमाए बगैर कैसे पीछे हट सकती है. लिहाज़ा वो तानाशाह की तान में तान मिलाने पर आमादा रहती है. अभी तक दिल्ली पुलिस इस  बात पर सफाई नहीं दे पाई है कि पास जारी करने में कोताही कैसे हुई. लेकिन राजनीति करने में इतनी माहिर जरूर हो गई है दिल्ली पुलिस कि उसे अब बकायदा बीजेपी का पुलिस सेल बना दिया जाना चाहिए. उसे जैसे मालूम था कि अपनी इस कोताही को छिपाने के लिए उस वीडियो का इस्तेमाल करना चाहिए जो मौलानाओं को थाने बुला कर उपदेश देते वक्त बनवाया गया था.

    आज संक्रमण के मामलों में सबसे ज्यादा उछाल  आया है. बड़ी तादाद में लोग संक्रमित हुए हैं . लेकिन पूरे देश का ध्यान कोरोना से हटा दिया गया. इधर राजनीति इतनी तेज़ हो गई कि इंसानों की मौत बेमानी हो गई. वेंटिलेटर औऱ सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं से ध्यान बंट गया. कोई नहीं पूछ रहा, ना ही पूछने दिया जा रहा कि बाज़ार से डेटॉल, हैंडवॉश, सेनेटाइज़ार मास्क, एन 95 मास्क क्यों गायब हैं.  अब नफरत की सियासत को एक खलनायक मिल गया. दिल्ली पुलिस को इस खोज का श्रेय जाता है कि सत्तारूढ़ पार्टी को एक ब़ड़ा मुद्दा दे दिया.  जो देश के बंटवारे के बाद नफरत की दीवार गांव-गांव, घर-घर के बीच खड़ी करने के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है.  

    पूरा मीडिया जैसे मुसलमानों को कोरोना फिदायीन साबित करने के लिए तैयार है. ताकि गृह मंत्रालय से ये ना पूछा जा सके कि मरकज के इज्तिमां को चलने क्यों दिया गया. और अगर चल रहा था तो जब  मरकज ने बसों के लिए पास मांगे तो पास जारी क्यों नहीं किए गए, जब मरकज ने लोगों की बिगड़ती तबियत का हवाला दे कर मांग की तो वो मुजरिम हो गया. 

    ये सिर्फ मरकज का मसला नहीं, अब आपके दिमाग से उन हज़ारों-लाखों मजदूरों की तकलीफ का मुद्दा धों-पोंछ कर साफ कर दिया गया. हालात ये है कि वो जो चाहते हैं, आप वही सोचते हैं. आप जो सोचते हैं, वो देश हित में नहीं है, या आप गलत मौके पर गलत बात कर रहे हैं.

    सच्चाई तो ये है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दो हफ्ते पहले ही कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया था, तो संसद की कार्यवाही 23 मार्च तक कैसे चलती रही. इस संसदीय कार्यवाही में कितने लोगों के संक्रमित होने की जानकारी इकट्ठी की गई. अगर नहीं की गई तो क्यों नहीं की गई. इसके लिए कौन जिम्मेदार है. यहां सोशल डिस्टेंसिंग का पालन ना होने के लिए किसी पर जिम्मेदारी तय की जाएगी या नहीं.

    जिस सोशल डिस्टेंसिंग के नाम पर टीवी न्यूज़ चैनल जमात औऱ तब्लीगियों को फिदायीन बताने में जुटे हुए हैं. उससे कई गुना ज्यादा तादाद में तो थके-हारे, भूखे गरीब मजदूरों से आनंद विहार बस अड्डा तीन दिन से ज्यादा वक्त तक पटा पड़ा था.

    जहां केजरीवाल ने यूपी-बिहार के मजदूरों को बसों में भर कर भिजवा दिया था. योगी आदित्यनाथ ने उन मजदूरों को उनके जिलों तक  पहुंचाने के नाम पर  दोगुना ज्यादा किराया वसूला था.

    अगर इन मजदूरों को 48 घंटे की मोहलत दे देते नरेंद्र मोदी तो वो 56 इंच के सीने वाले कैसे कहलाते. लॉकडॉउन से ठीक पहले उनके बहुत से उद्योगपति मित्र चालीस से ज्यादा विशेष विमानों से भारत आए थे. उन्हें भी नोटबंदी की तरह पहले से ही लॉकडॉउन की जानकारी दे दी गई थी. लेकिन उस गरीब जनता को कोई मोहलत नहीं दी गई कि वो अपने दुधमुंहे बच्चों के लिए कुछ साधन जुटा सके. मोदीजी को लगता है कि चंद लोगों को पता भी चला तो गरीब औऱ मजदूरों के दिमाग बदलने की मशीन तो उनके हाथ में है.

    लाखों मजदूरों की दुर्गति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माफी मांगने का नाटक किया. जाहिर था कि गोदी मीडिया अगले दिन से आक्रामक हो गया और मुसलमान यानि कोरोना साबित करने में जुट गया. मीडिया पूरे तीन दिन से कोरोना को मुसलमान और मुसलमान को कोरोना बताने में जुटा हुआ है.

    अगर जिम्मेदारी तय करनी है तो प्रधानमंत्री पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वुहान में संक्रमण फैलने के बावजूद ना तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप इसे खतरा मानने को तैयार थे ना ही पीएम मोदी. ट्रंप दौरे के दौरान गुजरात को दुल्हन बनाने में सौ करोड़ खर्च किए गए. देश की राजनीति में मोदीकाल की विशेषता ये है कि मोदी समर्थक और मोदी-मित्रों के लिए कानून-व्यवस्था को अपने अनुकूल बना दिया जाता है. ट्रंप स्वागत समिति कुछ दिन पहले ही तैयार की गई औऱ कई सौ करोड़ के न्यारे-वारे हुए. भारत ने भी वुहान पर कान नहीं दिए. राहुल गांधी ने चेताने की कोशिश की तो मोदीजी ने दिल्ली हाट में लिट्टी-चोखा खाकर कोरोना को मज़ाक बनाने की कोशिश की. 

    दरसल कोरोना पर देश में देर से एक्शन शुरू होने की एक औऱ बड़ी वजह मध्य प्रदेश की सरकार रही. ज्योतिरादित्य सिंधिया कमलनाथ-दिग्विजय की जोड़ी को को मज़ा चखाने पर आमादा थे तो बीजेपी के भाग से छीका टूटा था. सरकार गिराने के लिए कोरोना को किनारे रखना जरूरी था. जब तक एमपी सरकार गिर नहीं गई, कोरोना केंद्र सरकार के फैसलों के केंद्र में नही आया. 

    सरकार की कमियों और राजनीतिक स्वार्थों को भुला कर आपके दिमाग में जुगाली के लिए खलनायक की जरूरत थी. अब आप भूल चुके हैं कि कोरोना चीन से आया कि वुहान से आया. अब दिमाग में भर दिया जाएगा कि कोरोना कहीं से आया नहीं, बल्कि लाया गया है औऱ निजामुद्दीन में छिपा कर रखा गया है औऱ तब्लीगियों ने थूक-थूक कर कोरोना दिल्ली औऱ देश भर में फैलाया है.

    मोदीजी देश की अर्थव्यवस्था की हालत जानते हैं. लॉक़डॉउन के लिए उन्होनें कोई तैयारी नहीं की. लेकिन देश का मीडिया उनसे पूछने की हिमाकत नहीं करता है. कहते हैं कि कोई चारा नहीं था उनके पास. लेकिन माली मामलों में एक नहीं कई चारे दिमाग में घूम रहे थे. जिसमें से एक था पीएम केयर फंड. नामालूम क्यों प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष होने के बावजूद अध्यादेश ला कर पीएमकेयर फंड बनाया गया. जिसमें नेता विपक्ष को नहीं रखा गया है. जबकि पहले से ही बने राष्ट्रीय राहत कोष में नेता विपक्ष भी सदस्य होता है और बकायदा उसका सीएजी से ऑडिट भी होता है.

    मोदीजी की चौंकाने-डराने की खास अदा देश के हज़ारों गरीब, मजदूरों पर बेहद भारी पड़ी. जिनके पास ना खाने को दाने, ना ही कमाने के कोई साधन हैं. लॉकडॉउन के डर से प्रेमचंद के गोदान का गोबर गांव की ओर चल पड़ा अपने बच्चे-बीवी के साथ, उसके खयालों में अब भी वही गांव है, जहां होरी औऱ धनिया जैसे लोगों के लिए जगह थी. लेकिन कमबख्त गोबर भी कहीं खून उलट कर मर गया तो कहीं उसका दुधमुंहा बच्चा मुंआ गया.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माफी मांगने से क्या गोबर और उसका दुधमुंहा बच्चा वापिस आ जाएगा. उसकी बीवी क्या लौट पाएगी अपने गांव, क्या अब भी हैं पहले जैसे गांव- मिलजुल कर एक दूसरे का सुख-दुख बांटने वाले गांव.

    कोरोना के जरिए उन्हीं गांवों में बंटवारे के लिए सत्ता का खूनी खेल जारी है..व्हाट्स अप संदेशों से कोरोना औऱ मुसलमान, एक रूप दो नाम के रूप में फैलाया जा रहा है. जिस कोरोना ने किसी इंसान को शिकार करने में भेद नहीं किया, हम उसके नाम पर किसी मजहब को शिकार बनाने में आमादा है. गांव में फैलाया जा रहा है कि मुसलमान मान नहीं रहे हैं और कोरोना जानबूझ कर फैला रहे हैं. 

    राम मंदिर की जगह अब कोरोना ने ले ली है....कोरोना को गोल टोपी पहना दी गई है...अब गोल टोपियों को कोरोना बताने की सियासत जारी है....

     
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