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  • विश्व पृथ्वी दिवस पर प्रकृति का संदेश, जीवन-जगत को बचाने के लिए प्रेम और मानवता एकमात्र रास्ता
  • April 23, 2020
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                                                                  पृथ्वी दिवस 2020 और कोरोना के सबक 

     

    सतत विकास ही मानव जीवन का एकमात्र रास्ता

    पूंजी आधारित दुनिया कहीं पृथ्वी के लिए खतरा तो नहीं

    पृथ्वी को अपने पारिस्थितिकी तंत्र में दखल बर्दाश्त नहीं

    सस्ता श्रम, कौड़ी के दाम कच्चा माल, महंगा बाज़ार 

    मुनाफे के  कारोबार, दलाल सरकार और सबसे सस्ती जान

     

     

    पचासवें पृथ्वी दिवस ने हमें सोचने को मजबूर कर दिया है कि हम अपनी धरती को किस दिशा में ले कर जा रहे हैं. पूंजी पर आधारित दुनिया की अर्थ व्यवस्था और तकनीकी विकास क्या मानवता के लिए खतरा साबित होती जा रही है. कोरोना के विश्वव्यापी संक्रमण को देख कर लगता है कि क्या खुद पृथ्वी ने हमारे विकास का विरोध शुरू कर दिया है. कुछ लोग ऐसा मानते हैं तो कुछ का कहना है कि सौ बरस पहले भी तो स्पेनिश फ्लू ने दुनिया भर में लाकों लोगों की जान ली थी. महामारियों को तकनीकी विकास और प्रदूषण से जोड़ कर देखना लाजिम नहीं है.

     

    इन सवालों से पहले हम लॉकडॉउन के इस दौर में प्रकृति में आए बदलाव पर नज़र डाल लें तो शायद समझना-समझाना आसान होगा कि आखिर क्या चाहती है हमारी कुदरत. और क्या है उसका करिश्मा. हवा-पानी सब में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है. कहना ना होगा कि इन दिनों मानवीय गतिविधियां, कारोबार, रसायनिक फैक्टरियां बंद होने से नदियों का पानी साफ नज़र आने लगा है. नदियों के जल में ऑक्सीजन में एक फीसदी से ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है. नदियों के निर्मल पानी की कल-कल  जैसे कुदरत की खुशी के इज़हार है. हवा में भी प्रदूषण की कमी से सबक फेफड़ों में ऑक्सीजन भरने का अहसास हो रहा है.  राजधानी दिल्ली में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स यानि वायु गुणवत्ता सूचकांक 122 से घट कर 87 तक आ गया. पचास से सौ के बीच ये सेहतमंद समझा जाता है. यही नहीं, हवा साफ होने से आकाश नीला नज़र आने लगा और रात को आकाश गंगा का नज़ारा दिखने लगा. उधर पंजाब में तो जालंधर से हिमाचल के पर्वत-शिखर तक नज़र आने लगे. खबरों के मुताबिक दुनिया के की देशों में कोरोना के कारण लॉकडॉउन से औद्योगिक गतिविधियां रुकने से ओज़ोन लेयर में भी सुधार हुआ है. ओज़ोन लेयर के फटने से अल्ट्रॉ-वॉयलेट किरणें धरती तक पहुंचती हैं और इंसानों में कैंसर तक पैदा करती हैं. और सबसे बड़ी बात ये है कि  दिन रात चलने वाले वाले भारी-भारी उद्योग और व्यापार के पहिए रुकने से धरती का कंपन भी कुछ हद तक थमा है. भूकंप वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे विकास के पहिए से धरती कांपती रहती है, उसके कंपन में भी तीस से पचास प्रतिशत की कमी आई है.

    आए दिन आप सोशल मीडिया में शहर के भीतर बत्तखों की चहलकदमी और छोटे-छोटे जानवरों की शरारतों के वीडियों देखते हैं. सड़कों पर भी जंगली जानवर बेखौफ सोते दिखाई देते हैं अकसर. पहली बार उन्हें लगा है कि ये धरती सिरफ इंसानों की ही नहीं है. उनका भी इस पर कुछ तो हक है.

     

    तो ये प्रकृति की निराली छटा कुछ कहती है. कहती है कि कुछ ऐसा करो कि सब हंसी-खुशी मिल-जुल कर जिएें. आदमी औऱ जानवर जंगल, पहाड़,नदी और समंदर में खेलते-खिलखिलाते रहें. यही है सतत विकास, ऐसा विकास जो पारिस्थितिकी तंत्र को तोड़ने की हिमाकत ना करे. हवा, पानी, भोजन, धूप, बारिश सब एक दूसरे के सहारे चलता रहे, कभी ये थमें नहीं. 

     

    इन दिनों एक बदलाव और देखने को मिला है, बड़ा बदलाव है. जो कम ही नज़र आता था. वो ये कि कोरोना से लड़ाई के इस दौर में इंसानियत जाग गई है. उसे लोगों की तकलीफ का अहसास हो रहा है. लोग घरों से निकल कर उन लोगों को खाना खिलाने की कोशिशों में लगे हैं, जिनके पास एक वक्त भी खाने को नहीं हैं. लोगों की आंखें छलछला रही हैं. जिसके पास है वो खुद ना ले कर किसी और जरूरतमंद को देने के लिए कह रहा है. ये मानवता की बड़ी मिसाल है. जो सड़कों-सड़कों, शहर-शहर और गांव-गांव देखने को मिल रही है.

     लेकिन इसके भीतर डरे हुए लोगों की डरावनी कोशिशें भी देखने को मिल रही हैं. वो कोरोना के कहर को समझे बगैर एक दूसरे पर शक कर रहे हैं. उन्हें विकास का वो बड़ा पहिया नज़र नहीं आता, जिसके खौफ से धरती तक हर पल हिलती-कांपती रहती है. डर उन्हें उनका अपना भगवान-खुदा याद दिलाता है. डर से शक पैदा होता है. शक से सियासत शक्ल ले लेती है. सियासत दरसल मुनाफे की होती है. मुनाफाखोर वो है जो उस पहिए को चलाता है, जिससे धरती डरती है. उस पहिए को तेज़ करने के लिए सत्ता का खेल होता है. दुनिया की बिरादरी के बीच तिजारत का सबसे बड़ा पहिया चलता है.  अपनी अपनी ताकत के मुताबिक अलग अलग मुल्क उसे घुमाने की कोशिश करता है. वहीं मुल्कों के भीतर मुनाफाखोर सियासतदानों को हिस्सेदार बनाते हैं. सत्ता का चक्र घूमता है. आम आदमी उसमें पिसता है. साफ पानी, साफ हवा कीमत चुकाने वालों को ही नसीब होती है. कीटनाशक दवाईयों वाले सड़े अनाज़ का खाना ही उसकी आजादी है. जिसे पा कर उसे लगता है कि वो एक दिन जरूरत भर के प्रोटीन और कॉर्बोहाइड्रेट वाली थाली हासिल कर लेगा, यही उसके लिए अवसर की स्वतंत्रता है. फ्रीडम है, लिबर्टी है, इंडिपेंडेंस है, वो चाहे तो अमीर बनने का सपना देख सकता है, जरूरी नहीं कि बने ही. वो इस सपने के लिए अपना सब कुर्बान कर देता है.

    जब पौष्टिक खाना हीं मिलता तो इंसान की प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है. वो काम में मन नहीं लगा पाता, मानसिक परेशानियां घेरती हैं, नज़ला-जुकाम,बुखार,खांसी भी तंग करती है.कभी-कभी तो खड़ा होता है तो लगता है कि नशे में झूम रहा है. आमतौर पर नशे से खड़ा हो पाता है. हर दिन उस दिन के लिए, उस दिन जीने के लिए, उस दिन जीने भर को खाने के लिए. ऐसे में कोरोना उसके लिए मुक्तिदाता बन कर आता है. ऐसे जिंदा रहने और मौत के बीच फासले कम हो जाने की वजह से होता है. कुदरत उस फासले को कम कर देती है. कोरोना उनके लिए डीएनआर कोड बन जाता है.

     

    उसके हिस्से का प्रोटीन दुनिया के सौ बड़े घरानों की संपत्ति का हिस्सा बन चुके हैं. वो अपने हिस्से की मेहनत का सौदा हार चुका है हमेशा के लिए. उसे कोरोना से ज्यादा भूख से भय लगता है. भूख डराती है उसे. वो जो बड़ा पहिया घूम रहा है विकास का, वो इस शख्स से पैसा  छीन कर बड़े घरानों के खजानों में ले जा कर भर देता है.

     

    ये बड़े घराने अपने मुनाफे के लिए पूरी कुदरत को मथ रहे हैं. इंसानों का खून-पसीना और प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ने की लड़ाई जारी है. फिर इन्हीं को बेचने की भी तैयारी है. लेकिन अब दमन का ये पहिया इतना कुचल चुका है कि ना किसी की जेब में पैसा है ना ही राशन के अलावा कोई सपना है. लेकिन राशन से भी पड़ोसी बनिए का हक छीना जा चुका है. फेसबुक-व्हॉट्सअप के जरिए उसे जियो किराने का डिलेवरी बॉय बनाने की तैयारी हो चुकी है. अगले आम चुनाव का खर्च मिलने की आस में हाकिम के चेहरे पर बोटोक्स की लाली छा गई है.

     

    लेकिन प्रकृति ने विकास के पहिए पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वो अपने गुस्से के इज़हार के लिए धर्म-मजहब, जाति, वर्ग में फर्क नहीं कर रही. प्रकृति का अपना पारिस्थितकी तंत्र है. कोरोना एक सिंप्टम भर है. जो दमन और शोषण वाले भेदभाव भरे समाज में पनपता है. सौ साल पहले भी जब उपनिवेशों को लेकर दुनिया भर में अत्याचार, दमन और शोषण से पृथ्वी डोल रही थी तब उसने एक बार अपना गुस्सा दिखाया था. दुनिया भर में लाखों लोग हलाक हुए थे. इस पृथ्वी दिवस पर फिर उसने याद दिलाया है कि विकास वही है जिससे प्रकृति और उसके खिलौनों पर कोई दूसरा अपनी मर्जी ना चला सके. लेकिन बेबस मानवता के इलाज़, दवाई औऱ तीमारदारी के नाम करोड़ों-अरबों का माल कमाने का खेल फिर शुरू हो गया है. 

    अंशुमान त्रिपाठी

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