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  • मरीज भी अब तुम्हारे हवाले साथियों, हल्के लक्षणों पर घर में इलाज़ की सशर्त छूट के मायने -अंशुमान त्रिपाठी
  • April 29, 2020
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                                              मरीज भी अब वतन के हवाले साथियों , घर पर ही कराओ सशर्त इलाज़ 
     
    - अंशुमान त्रिपाठी
     
    क्या कोरोना संक्रमण की बढ़ती तादाद के सामने सरकार ने डाले हथियार
     
    देश में कोरोना संक्रमण तीस हज़ार पार कर चुका है और एक हज़ार लोग काल-कलवित हो चुके हैं. दिल्ली में सौ से ज्यादा हॉटस्पॉट बन चुके हैं. वहीं केंद्र सरकार अब कोरोना को धीरे-धीरे आम ज़िंदगी का हिस्सा मानने की तैयारी कर रही है. खासकर जब सरकार ने खुद रैपिड किट टेस्ट को बेमानी बताना शुरू कर दिया हो और चाइना की कंपनियों को दिया गया ऑर्डर कैंसिल कर दिया गया हो.  पहले देश इस बात के लिए फिक्रमंद था कि ज्यादा से ज्यादा टेस्ट हों ताकि हर गांव, हर घर तक सेंध लगाने वाले कोरोना की पहचान हो सके. अब सरकार ने मान लिया है कि एक सौ छत्तीस करोड़ देशवासियों से थाली और ताली बजवाई जा सकती है, लेकिन सबका टेस्ट संभव नहीं है. चाहे रैपिड टेस्ट ही क्यों ना हो.  यही नहीं ज़रूरी पीपीई किट्स मंगाने में लापरवाही औऱ देरी से कई कोरोना वॉरियर्स की बलि चढ़ने पर भी सरकार को कोई अफसोस नही महसूस हो रहा है. देश में भूखों की भीड़ के पुलिस पर बढ़ रहे हमले, चार –चार दिन से खाली पेट महिलाओं और दुधमुंहे बच्चों की तकलीफ का सरकार को कोई इल्म ही नहीं है. 60 फीसदी बंद पड़े काम-धंधे, घरों में बंद नेता और फालिज से जूझ रही सरकार से इसके अलावा उम्मीद क्या की जा सकती है.
    ज़ाहिर है कि अब कोरोना को लेकर सरकार किसी हड़बड़ी में नहीं है. पीपीई से लेकर टेस्ट किट खरीदी में मुनाफाखोरी में नेतापुत्रों के शामिल होने की खबरें आ रही हैं. लेकिन सरकार इज़रायल और अमेरिका की मिज़ाजपुरसी के लिए टनों में जिस दवाई की खेप एक धमकी पर पहुंचा चुकी है, अब घर में इलाज़ के वक्त उसी दवाई का बगैर किसी लक्षण के भी मरीज और उसके परिजनों को सेवन के लिए अनिवार्य बता रही है. आपको याद होगा, हाइड्राक्सीक्लोरोक्वीन की विदेशों को सप्लाई के बाद जब देश में इसकी कमी की खबरें आने लगीं थी तो उन खबरों को दबाने के लिए कहा जाने लगा कि ये कोरोना के इलाज़ में बहुत कारगर नहीं साबित हुई,बल्कि इससे नुकसान का अंदेशा है. अब सरकार के नए नीति-निर्देश में उसी हाइड्राक्सीक्लोरोक्वीन को चिकित्सकीय परामर्श से मरीज की देखभाल करने वाले के लिए भी लेना आवश्यक बताया गया है.
          मोदी सरकार के फैसलों में एक खास पैटर्न देखा जा सकता है. इसकी विशेषता है कि ये फैसले पहले लेती है और उनमें सुधार बाद में ज़रूरत औऱ फायदे के मुताबिक बाद में करती रहती है. देश की जनता तकलीफ उठाने के लिए मजबूर रहती है. नोटबंदी में भी हर दिन नए सर्कुलर आते रहे. ऐसे सर्कुलर जो पिछले की मुखालिफत करते रहे. यही रिवाज़ अब भी देखा जा सकता है. पहले रैपिड टेस्ट किट ज़रूरी बताई गई और उसके भारत आयात को इस तरह पेश किया गया कि किट आते ही कोरोना डर कर ही भाग जाएगा. लेकिन उसमें छुपी मुनाफाखोरी सामने आने पर रैपिड किट टेस्ट ही बंद करा दिए गए. हालांकि रैपिड टेस्ट किट संक्रमण बताने के बजाय किसी के शरीर में संक्रमण के विरुद्ध एंडीबॉडी की मौजूदगी का टेस्ट है, मरीज के थूक-खखार के आरटी-पीसीआर टेस्ट से ही संक्रमण का पता चलता है. लेकिन रैपिड टेस्ट कोरोना संक्रमण की आशंका के मद्देनज़र ज़रूरी समझा जाता रहा. अब खुद आईसीएमआर इसके खंडन कर रही है. आरसीएमआर किसी मेडिकल बॉडी से ज्यादा व्यापारिक-राजनैतिक संस्था की तरह काम करती नज़र आ रही है.
         खैर, ये तो होना ही था. सरकार के खून में व्यौपार है. सरकार मुर्दों का क्या करेंगे, जिंदा है तो ही माल खपेगा. सो सरकार फटाफट व्यौपार का लॉकडॉउन खोलने के लिए परेशान हैं. कोरोना को तो उन्होंने चारों तरफ से घेर लिया है. आप मानें या ना मानें, दुनिया की कई हस्तियां अखबार-चैनलों की सरकारी खबरें पढ़ कर प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रही हैं. उन्हें ये मालूम ही नहीं कि ये खबरें उनसे तारीफ पानें और देश की अनपढ़ जनता को गुमराह करने के लिए ही छपवाई जा रही हैं. उन्हें शायद ये भी पता नहीं कि भारत ही ऐसा एक लोकतंत्र है जहां मीडिया सरकार के संकट में सबसे ज्यादा काम ही नहीं आता है बल्कि उसकी गलतियां-गुनाह माफ करते हुए हौसलाअफज़ाई भी करता है. 
    सो, अब बारी है अपने-अपने घरों में इलाज़ करवाने की. जिस देश में कोरोना के खौफ से सब्ज़ियां भी मजहब देख कर खरीदी जा रही हों, मजहब देख कर मॉब लिंचिंग की जा रही हो,डॉक्टरों, नर्सों, पत्रकारों, महिलाओं और मुसलमानों को कोरोना के डर से कॉलोनियों-सड़कों, शहर-गांव में डराया-धमकाया या मारा-पीटा जा रहा हो, वहां होम आसोलेशन के मायने क्यां हैं, क्य़ा किसी मोहल्ले में कोई होम-आईसोलेशन में होगा तो पास-पड़ोसी उसके मुसलमान होने पर क्या दुर्गति करेंगे, कहा नहीं जा सकता. जिस कोरोना के खौफ से हिंदुओं का अंतिम संस्कार मुसलमानों को करना पड़ रहा है, वहां आप समझ सकते हैं कि कितनी अराजक स्थिति पैदा होगी. लेकिन समाज के बंटने से सरकार को 2024 के बाद भी सत्ता का सुख मिलेगा. आप खुद समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने गौरक्षकों के मामले में भी तब तक लंबी चुप्पी साध रखी थी जब तक जनता त्राहि-त्राहि नहीं करने लगी थी. अब जब खाड़ी देशों ने आरएसएस के स्वयंसेवक की कंपनी बंद करके भारत नहीं भेज दिया, तब तक मोदीजी ने जनता को भाईचारे का संदेश नहीं दिया.
    लेकिन अब घर में इलाज़ कराने के क्या मायने हैं, इस पर सोचने की ज़रूरत है. ज़ाहिर है कि घर में वो तीमारदारी संभव नहीं हो पाएगी जो अस्पतालों में होती है. दूसरे कि हालात बिगड़ने पर इन हालात में अस्पताल से संपर्क कर पाना अपने आप में बड़ी मुश्किल का काम है. इन सबसे बड़ी बात ये है कि मरीज के अटेंडेंट और जिला निरीक्षण अधिकारी के बीच संवाद-सूत्र कितना नियमित औऱ कारगर हो पाएगा, ये संदेहास्पद है. लेकिन सरकार को फायदा ये है कि वो अब इन मरीजों की ज़िमेमेदारी से निजात पा जाएगी. वक्त पर इलाज़  दवाई ना मिलने पर उसे कोसा नहीं जा सकेगा. हो सकता है कि इसकी वजह से बहुत से लोग सरकार को सूचना दिए बगैर ही खुद ही अपना इलाज़ अपने ही घर में शुरू कर दें. हालांकि सरकार ने इसे अपराध माना है लेकिन ये दिशा-निर्देश अब सरकार की शिथिलता की ओर इशारा कर रहा है.
          इन सबसे बड़ी बात ये है कि जिस कोरोना से भारत में मौत से ज्यादा संक्रमण का खतरा महसूस किया जा रहा है, वहां, किसी को होम-आइसोलेशन में रखने की अनुमति देने में उसके परिजनों के संक्रमित होने का जोखिम काफी ज्यादा है. क्या सरकार अब संक्रमण की तादाद को लेकर बेफिक्र हो चुकी है. क्या अब उसे, इससे फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग संक्रमित हो रहे हैं. क्या वो कथित हर्ड इम्युनिटी को ही इलाज मान बैठी है. इस सरकार को नोटबंदी उर्फ नोटबदली के वक्त भी यही लगा ता कि गरीब-मजदूर भूख और बेरोज़गारी के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेंगे और इसे एक सच्चाई की तरह स्वीकार कर लेंगे. हर्ड-इम्युनिटी कहती है कि जब बड़ी तादाद में संक्रमण होता है तो उस समाज में धीरे-धीरे प्रतिरोध क्षमता विकसित हो जाती है. आखिर सरकार की रणनीति क्या है. नोटबंदी में भी गरीब भूख से मरने को मजबूर था और नेता-दलाल नोटबदली में पैसा कमाने में मशगूल थे, बिल्कुल उसी तरह अब रैपिड टेस्ट किट, पीपीई , सैनिटिज्र्स, थ्रीलेयर मास्क और वैंटिलेटर के धंधे में माल कमाने में मसरूफ है. आलम ये है कि सरकार को पीएमएनआरएफ होने के बावजूद पीएमकेयर फंड बनाने पर उठ रहे सवालों से कोई फर्क नहीं पड़ता, जिसमें निजी ऑडिटर से जांच कराने की व्यवस्था रखी गई है.
         यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी निर्देश के मुताबिक ऐसे मरीज जिनमें हल्के लक्षण नज़र आ रहे हैं य़ा जो प्रीसिंप्टोमेटिक मरीज हों, और डॉक्टर इसकी पुष्टि करता है तो उन्हें होम-आईसोलेशन के लिए ये सुविधा प्रदान की जा रही है,यहां डॉक्टर के परामर्श की आड़ ले कर कुल मरीजों की बड़ी तादाद को घरों में बंद करने की योजना पर काम हो रहा है. लेकिन सवाल ये है कि क्या हल्के लक्षण वाले मरीजों के गंभीर संक्रमण के शिकार होने का खतरा नहीं होता. प्रीसिंप्टोमैटिक मरीज से क्या आशय है. मोटे तौर ये माना जाए कि जो मरीज रिकवर हो कर जा रहे हैं, वे हल्के लक्षण या प्रीसिंप्टोमैटिक हैं. क्या सरकार ने ये फैसला लेने से पहले  मरीजों का सर्वेक्षण करवाया है. क्या ऐसा कोई निष्कर्ष सामने आया है कि एसिंटोमैटिक या हल्के लक्षण वाले मामलों में मरीज की जान को कोई खतरा नहीं होता. ऐसे में अगर रात को किसी मरीज की अपने घर में मौत हो जाती है तो क्या उसे मोहल्ले से निकाल अंतिम संस्कार करने ले जाना आसान होगा. इसे मूर्खता की पराकाष्ठा कहा जा सकता है. जहां मृत्युदर अधिक है, वहां मरीज को अस्पताल ला कर रखा जाता है और प्लास्टिक के बॉडी बैग में उसका पार्थिव शरीर या तो परिजनों को दिया जाता है. लेकिन होम-आईसोलेशन के हालात में ऐसी त्रासदी होने पर क्या होगा. अस्पताल के बजाय मोहल्ले-मोहल्ले,जगह-जगह अवसाद,आशंका,दर्द और पीड़ा का माहौल बनेगा. क्या इससे सरकार की जवाबदेही कम मानी जाएगी. सरकार का तर्क है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसकी इज़ाजत देता है, लेकिन जो गाइडलाइन्स डब्ल्यूएचओ ने तय की हैं क्याहमारे देश में उनका पालन हो पाना मुनासिब है. दक्षिण कोरिया में ज़रूर ये सुविधा दी जा रही है लेकिन वहां नियमों का उल्लंघन करने पर 2500 डॉलर का जुर्माना तय किया गया है. वहीं जापान ने दो मरीजों की मौत के बाद ये सुविधा बंद कर दी. सिंगापुर मरीज के परिजनों की सुरक्षा के मद्देनज़र होम-आइसोलेशन की इज़ाजत नहीं देता 
    ऐसे में सामर्थ्यवान, धनाढ्य या किसी विशेष परिस्थितियों में ही किसी मरीज को होम-आईसोलेशन की सुविधा देने का ही प्रावधान किया जाए. लेकिन ये तय है कि प्रशासन के रवय्यै से मरीजों के परिजनों पर ऐसा दबाव बनना शुरू हो जाए कि वो अब होम-आआइसोलेशन को ही इलाज़ का तरीका मान बैठें.
    -अंशुमान त्रिपाठी

     

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