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  • हिंदू न्यूज़ चैनलों का उदय़, कंटेंट, रेवेन्यू मॉडल औऱ भविष्य - अंशुमान त्रिपाठी
  • September 15, 2020
  •   "हिंदू न्यूज़ चैनलों" का उदय और भविष्य


     -अंशुमान त्रिपाठी


    सुप्रीम कोर्ट ने लगाई सुदर्शन टीवी के एक कार्यक्रम पर रोक

    घृणाधारित कंटेंट से मुनाफ कमाने के खेल पर पड़ी अदालत की नज़र

    शेयर होल्डिंग पैटर्न, रेवेन्यू मॉडल और आय का लेखाजोखा मांगा


    सबके मालिक एक..!


      आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन न्यूज़ चैनल के मुस्लिमों के सिविल सेवा परीक्षा में कथित घुसपैठ के खिलाफ बने कार्यक्रम पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी. ये एक बदलाव का संकेत है. जस्टिस वायबी चंद्रचूड़ और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच ने इस मामले के जरिए हिंदी न्यूज़ चैनलों के हेट फॉर प्रॉफिट के रेवेन्यू मॉडल का भी खुलासा करने को कहा है. केएम जोसेफ ने इन चैनलों के मालिकों की जानकारी मांगी औऱ कहा कि इन कंपनियों का शेयर होल्डंग पैटर्न को इनकी वेबसाइट पर डाला जाना चाहिए. साथ ही उन्होंने कहा कि इन चैनलों का रेवेन्यू मॉडल भी देखना ज़रूरी होगा ताकि क्या सरकार दूसरे चैनलों के मुकाबले कुछ चैनलों को अधिक विज्ञापन तो नहीं दे रही है. 

    यहां ये देखना काफी दिलचस्प होगा कि इन चैनलों का शेयरहोल्डिंग पैटर्न, रेवेन्यू मॉडल क्या है और किसे-कितना सरकारी विज्ञापन दिया जा रहा है. इससे चैनलों पर किसका कितना मालिकाना हक है, ये साफ हो सकेगा. ये भी पता चलेगा कि सबका मालिक एक है. चाहे वो सरकार या सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया हो या मुखियाजी के भामाशाह.

    दरसल आज के दौर में पूरे देश औऱ समाज में हिंदी न्यूज़ चैनलों की छवि बहुत खराब हो गई है. दिलचस्प बात ये है कि जो मेनस्ट्रीम मीडिया समाज को किस व्यक्ति, घटना या नीति को लेकर धारणा बनाने में मदद करता है, आज उसी की छवि समाज की नज़रों में गिर रही है. सबसे चिंता की बात हिंदी न्यूज़ चैनलों के हिंदू न्यूज़ चैनलों में तब्दील हो जाने की है.ऐसा लिखते हुए बुरा लग रहा है. क्योंकि ज़िंदगी के तीस साल इन्ही में गुजरे हैं. दरसल ये हिंदू ढाबा की तरह है, जहां मुनाफे के लिए कुछ भी परोसा जाता है.

       यहां ये जिक्र करना ज़रूरी है कि प्रिंट मीडिया की छवि इतनी खराब नहीं हुई है. क्योंकि विज्ञापन की वहशी दौड़ में अपने एडिटोरिय़ल कंटेंट से बहुत छेड़छाड़ नहीं करता है.अगर करता भी है तो सधे हुए ढंग से, जो नज़र नहीं आता. वहां विज्ञापन के लिए एटवर्टोरियल पेज परिशिष्ट अलग से जोड़ा जाता है. कहीं कहीं संपादकीय विश्लेषण किसी पार्टी विशेष के पक्ष में नज़र आता है, लेकिन अमूमन एक तटस्थता बना कर रखी जाती है. य़े अलग बात है कि कुछ अखबार, पत्रिकाएं और न्यूज़ वेबसाइट्स अपने सत्ता-विरोधी औऱ सत्ता समर्थक रुख के लिए पहचानी जाती है. लेकिन फिर भी सांप्रदायिक रिपोर्टिंग को लेकर एहतिय़ात बरतने की कोशिश होती है.

    लेकिन आज की युवा पीढ़ी ये देख कर बहुत हताश है कि हिंदी न्यूज़ चैनल ना सिर्फ देश के संविधान की मूल भावना की धज्जियां उड़ा रहे हैं बल्कि मानवता के ताने-बाने को तार तार कर रहे हैं.

    यहां ये बताना लाजिमी होगा कि आज देश की मिलेनियल जेनरेशन इसीलिए हिंदी न्यूज़ चैनल देखने के बजाय सोशल मीडिया पर शिफ्ट हो गई है. वो मनोरंजन के अलावा रोजगार, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य़ और विज्ञान से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जुड़ी खबर देखना चाहती है. जो उसे सोशल मीडिया के बड़े कैनेवास पर आसानी से उपलब्ध है. फिर भी इन चैनलों के धंधे पर कोई खास असर नहीं पड़ा है.

    यहां थोड़ा धंधे की बात कर लेते हैं. चैनल के धंधे की, कैसे चलता है चैनलों का धंधा. कहा जाता है कि जो बिकता है वो दिखता है. खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसी सिद्धांत पर काम करता है. यहां बताना ज़रूरी है कि डीडी फ्रीडिश और दूसरे डीटीएच के ग्रामीण इलाकों में विस्तार से नया दर्शक वर्ग जुड़ रहा है. ये वर्ग राष्ट्रीय बहस को बहुत दिलचस्पी से देख रहा है औऱ प्रत्य़क्ष-अप्रत्य़क्ष रूप से इसमें हिस्सा ले रहा है टीवी. प्रिंट, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए.अगर वो अपनी विरोधी विचारधारा वाले को ट्रोल भी कर रहा है तो ये भी उसकी भागीदारी ही है. यही नहीं, जो लोग इतिहास, राजनीति और समाज शास्त्र से अलग विषयों की पढ़ाई कर नागरिक बनें हैं, वो भी इस डिबेट को देखना सुननाऔर हिस्सा लेना चाहते हैं. सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता,कौमी एकता, भाईचारा, आस्था, बुनियादी अधिकार, बोलने की स्वतंत्रता, देशप्रेम और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों के बारे में जानना चाहते हैं.

    यहां तकलीफ बात ये है कि एक समावेशी समाज, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति के अधिकार की बहस कमजोर पड़ रही है. ना तो गैर बीजेपी दलों ने सरकार में रह कर सत्ता सुख तो लिया लेकिन सांप्रदायिकताकी विकरालता को नहीं समझा, बल्कि समय-समय पर समझौता ही किया. वहीं विकास के नाम पर सत्ता में आई मोदी सरकार ने जनमत को हिंदू बहुमत के अनुवाद के रूप में पढ़ा. सिर्फ पढ़ा ही नहीं, लोगों को ये मानने को मजबूर भी किया जा रहा है

               हालांकि इससे पहले भी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आ चुकी है. लेकिन इस बार बीजेपी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजेंडे को लागू करने का मन बन कर सत्ता में आई है. संघ हिंदू राष्ट्र में विश्वास करता है लेकिन बात लोकतंत्र की करता है. इसीलिए मोदी सरकार सबका साथ-सबका विकास की बात तो करती है लेकिन वो मुस्लिम-विरोध में विश्वास करती है.दिल्ली के दंगे, जेएनयू, जामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पुलिस औऱ गुंडों के जरिए मारपीट, सीएए-एनआरसी को लेकर देश भर में गिरफ्तारियां औऱ मुस्लिम विरोधी माहौल बनाना इसी रणनीति का सोचा समझा हिस्सा है. और देश को हिंदू-प्रधान राष्ट्र बनाने की पैरवी इन दिनों खूब न्यूज़ चैनलों पर दिखाई-सुनाई पड़ती है. ये डिस्कोर्स देश की जनता के लिए नया है. वो ये भी जानना चाहती है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने सेकुलरिज्म के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का कोई मौका नहीं छोड़ा. हिंदू सांप्रदायिकता के खिलाफ जोर से हुंकार भरी गई लेकिन मुस्लिम सांप्रदायिकता पर बहुत धीमी सी प्रतिक्रिया दी गई. दूसरे की थाली में घी ज्यादा देख कर निस्संदेह हिंदू भावनाओं का उबाल सामने आने लगा. संघ-बीजेपी यहां पांच साल भर के लिए शासन करने के लिए काबिज बदलाव करने का है औऱ भारत को हिंदू राष्ट्र ना सही हिंदू-प्रधानराष्ट्र में तब्दील करने का है. जो दिनोंदिन होता भी जा रहा है.

                   कोई कुछ भी कहे, झगड़ा कहीं भी हो रहा हो, लोग खड़े हो कर सुनने लग जाते हैं. दो लोग प्यार से बात कर रहे हों तो कोई रुकना भी पसंद नहीं करता. टीवी चैनलों ने सत्ता के इशारे पर हिंदू-मुस्लिम डिबेट को खूब हवा दी. क्योंकि संघ की मुस्लिमों के प्रति घृणा जग जाहिर है. यहां पाकिस्तान-बनाम भारत भी शुरू हो गय़ा. पाकिस्तान के बहाने मुस्लिमों को निशाने पर लेना आसान हो जाता है. य़े अळग बात है कि हिंदुस्तानी मुसलमान कभी भी पाकिस्तान की पैरवी में यकीन नहीं करता. लेकिन हिंदू कट्टरपंथी इसे नाटक बता कर हिंदुओं को उकसाने का काम करते हैं. उकसाने के लिए टीवी पर डिबेट शुरू हुई. यहां ये बताना दिलचस्प होगा कि कुछ साल पहले यानि 2014 से पहले एक स्टिंग ऑपरेशन किया गया था जिसमें मीडिया हॉउसेज़ को लगातार सीरीज़ के रूप में हिंदुत्व को बढ़ावा देने वाली खबरों के रूप में चलाना था. कई करोड़ो रुपयों की डील थी. तब कई नामी मीडिया हॉउस इसकी जद में आए और क्लाइंट की मनमर्जी का कंटेंट ना सिर्फ चलाने बल्कि डेवलप कराने तक का ठेका लेने को लालायित नज़र आए. हालांकि ये नकली ऑपरेशन था. लेकिन आज के दौर में जिस तरह से हिंदी न्यूज़ चैनल हिंदू न्यूज़ चैनलों में तब्दील होते जा रहे हैं, उससे साफ है कि तब ना सही लेकिन अब सही, इसी रणनीति पर काम हो रहा है.

    पहले भी विज्ञापन के लिए खबरें चलाने और खबरें गिराने का काम अखबारों में होता रहा है. लेकिन हिंदू न्यूज़ चैनलों ने तो गज़ब ही कर दिया. दरसल कॉर्पोरेट सेक्टर के विज्ञापन के लिए बार्क की रेटिंग का कड़ा पैमाना है. इस पैमाने पर खरा उतरने के लिए 35-40 करोड़ रुपए का केबल और डीटीएच प्लेटफॉर्म्स पर डिस्ट्रिब्यूशन करना पड़ता है और अगर नेशनल न्यूज़ चैनलों की बात की जाए तो इतना ही कंटेंट डेवलपमेंट और सेलरी का खर्च आता है. ऐसे में खर्च पूरा करने के लिए सरकारी विज्ञापनों की खासी ज़रूरत पड़ती है. इसे पाने के लिए सबसे आसान औऱ सस्ता जरिया है आरएसएस की विचारधारा से जुड़े संपादकों औऱ एंकरों की नियुक्ति. इसके दोहरे फायदे होते हैं. एक तो घृणा पर आधारित कंटेंट के दर्शक ज्य़ादा होते हैं, दूसरे सत्तापक्ष के समर्थन से सरकारी विज्ञापन हासिल करने में भी आसानी होती है. तीसरे कई कॉर्पोरेट और रिटेल क्षेत्र के विज्ञापनदाता भी जुड़ने लगे हैं. बल्कि कई नवोदित चैनलों की रणनीति यही है. ईससे टीआरपी भी बढ़ती है औऱ विज्ञापन भी दोनों हाथों से लूटने का मौका मिलता है. यहां आंकड़ों का हवाला देने की ज़रूत इसलिए नहीं है क्योंकि आम पाठक को इस बात का खूब इल्म है कि सरकार किस तरह से इन चैनलों को पाल रही हैं. वहीं बहुत से चैनलों को बेमौत मरने के लिए मजबूर कर दिया गया है. कौन नहीं जानता कि मीडिय़ा का धंधा आम तौर पर मुनाफा छिपाने का होता है, कमाई दिखाने का नहीं. मीडिया के एक बहुत स्थापित पुराने व्यापारी जो चैनलों के अलावा बहुत पहले से पत्रिका निकालते रहे हैं और प्रेस भी चलाते हैं. वो भी पॉपुलिस्ट कंटेंट की दौड़ में शामिल हो गए. हुंकारने और फुंफकारने वाले एंकर-एंकरनियों की भर्ती कर डाली. विपक्ष को गरियाने वाला कंटेंट खूब बनने औऱ चलने लगा. लेकिन “बनाना रिपब्लिक” के एक चैनल ने धो डाला औऱ कहा कि 18 साल का घमंड हमने तोड़ दिया. सर्वश्रेष्ठ का तमगा भले ही खरीद लिया जाता हो, लेकिन देश के बौद्धिक वर्ग में अब वो पहले की तरह साख नहीं रही. मज़े की बात तो ये है कि एक दिन बैलगाड़ी के कुत्ते की तरह चलने वाला ये चैनल भूल गया कि सरकार उसे चला रही है. खबर है कि किसी खबर पर संपादकीय स्वतंत्रता के नाम पर सत्ता विरोधी खबर चलाने पर नॉर्थ ब्लॉक बुलवा लिए गए. इतना अपमान तो इमरजेंसी का विरोध करने पर नहीं हुआ था. 

    छोटे मीडिया हॉउसेज़ के बस की ये बात नहीं. वो रोजमर्रा का खर्च पूरा करने को कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. कुछ भी मतलब कुछ भी. ब्लेकमेलिंग से लेकर धोखाधड़ी और दलाली तक. संपादक का चुनाव भी इसी बिना पर होता है.व्यापारी को मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है.

    अब हिंदी के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों में हिंदू कंटेंट और हेट कंटेंट चलाने की होड़ लग गई. फर्क सिर्फ विज्ञापन के रेट का था, क्वालिटी एक जैसी. मामला अगर यहीं तक रुक जाता तो भी गनीमत थी. धीरे धीरे हिंदी न्यूज़ चैनलों ने सत्ता के सिपाही की ड्यूटी शुरू कर दी. गोलवलकरजी ने भी कभी ये नहीं सोचा होगा कि ये अशिक्षित लोग पैसे के लिए उनकी बंच ऑफ थॉट में छिपी हुई विचारधारा को गंदा नाला बना डालेंगे. हैरानी की बात ये भी है कि संघ में अब वो वैचारिक उदात्तता भी नहीं रह गई, जो कभी कांग्रेस से लड़ने के लिए उसी की तरह विरोधी विचारों को भी खुद में आत्मसात कर लेती थी. अब तो अपने घृणा-आधारित प्रचार से उपजे खतरे के डर से संघ भी जेड सिक्योरिटी का लुत्फ लेने लगा है. संघ प्रमुख प्रमुख सरकारी संत हो चले हैं. बुद्धिजीवी लोग निकाल दिए गए. भृष्ट कांग्रेसी बीजेपी में भर लिए गए. आरएसएस अपने सौ साल पूरे होने के पहले दो-तीन साल पहले ही केंचुल उतारने में तुली हुई है.

     मोदी सरकार ने अपनी बढ़ती अलोकप्रियता को छिपाने के लिए खबरों का एजेंडा सेट करना शुरू कर दिया. एएनआई वीडियो न्यूज़ एजेंसी सरकार की पसंदीदा एजेंसी हो गई. वीडियो न्यूज़ शुरू करने से पहले ही पीटीआई पर सरकार की गाज गिर गई. सोशल मीडिय़ा में खबरों को मैनेज करने का जो तरीका चल रहा है, वो पहले से ही चर्चा में है. हेडलाइन मैनेजमेंट  प्रधानमंत्री कार्यालय से होने लगा. मौके-बेमौके पीएमओ से चैनलों की दरयाफ्त होने लगी. 

    हिंदू न्यूज़ चैनलों ने एक कदम आगे जा कर एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया. डिबेट में विपक्ष के प्रवक्ताओं से बीजेपी प्रवक्ताओं की रक्षा का काम ले लिया. साथ ही बीजेपी प्रवक्ता को हर अनर्गल प्रलाप की छूट दे दी. यानि कुल मिला कर डिबेट को इक तरफा बनाने का काम तेज़ हो गया. कुछ ने तो बकायदा बहस में इंटेंसिटी दिखाने के लिए अभिनय के गुरों का इस्तेमाल शुरू कर दिया. हाइपरडिबेट्स ने हाइपर नंबर भी देने शुरू कर दिए. देखादेखी दूसरे चैनल भी इसी राह पर हैं. हैरानी की बात ये है कि ये चैनल दिन की खबरों का एजेंडा सेट करने लगा. हर न्यूज़ चैनल को टीआरपी के लिए इस चैनल पर हर पल नजर रखनी पड़ती है.

    य़ानि पिछले छह साल से सत्ता समर्थक और विपक्ष विरोधी पत्रकारिता का दौर जारी है. दरसल पत्रकारिता की परिभाषा औऱ उद्येश्य ही सत्ता के विरोध में सन्निहित है. जिसे जनता की वकालत भी कहा जाता है. लेकिन जनता की अदालत लगाने वाले दरसल बीजेपी के वकील निकले. कांग्रेस के दौर में सत्ता का विरोध करते ये पत्रकार आदर्शवादी माने जाते रहे हैं. लेकिन मोदी सरकार के आते ही सबने मुखौटे उतार दिए. कांग्रेस की मदद से कांग्रेस को कमज़ोर करते रहे और खुद अमर बेल की तरह चैनलों के मालिक हो गए. अब ये सत्ता विरोधी पत्रकारिता की बात नहीं करते.

    कोरोना से रोज बढ़ती मौतों के बजाय ये ये हिंदू न्यूज़ चैनल सुशांत सिंह राजपूत की बात करते हैं. बिहार चुनाव के मद्देनज़र रिया चक्रवर्ती को डायन की तरह घेर कर मारते हैं. उस पर जादू-टोना-मंतर-मूठ करने जैसे आरोप लगाते हैं.राजपूत वोटों के लिए कंगना रानावत को मैदान में उतारते हैं. पिछले एपिसोड में रिया जेल चली जाती है तो अलग एपिसोड में तमतमाई रिय़ा पीओके य़ानि मुंबई पहुंच जाती हैं. रिया की भाषा में बीजेपी का शिवसेना के अलग होने का फ्रस्ट्रेशन यहां साफ दिखाई पड़ता है.साफ लगता है कि उसका ट्वीट हैंडल भी बीजेपीआईटी सेल के पास है.देश भर में बेरोजगारी को लेकर विरोध होता है लेकिन हिंदू चैनल उस तरफ झांकते भी नहीं. गुजरात, यूपी और बिहार में कोरोना से डराने वाली खबरें आ रही हैं. लेकिन हिंदू न्यूज़ चैनलों में नज़र नहीं आएंगी. लद्दाख सीमा पर चीनी घुसपैठ को पहले तो राष्ट्रवादी हुंकारों में इन चौनलों ने बदल दिया. लेकिन जब सरकार को लगा कि इससे बड़ी फज़ीहत हो रही है तो इन चैनलों ने बताना शुरू कर दिया कि पीएम मोदी ने क्वारंटाइन में रहते रहते ही कैसे कूटनीति में चीन को धूल चटा दी और वो बाप बाप करने लगा. कैसे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उंगली दिखा कर रोबीले अंदाज़ में चीनी विदेशमंत्री से बात की और वो मीटिंग के लिए वक्त की भीख मांगता रहा.  यही नहीं, साथ ही फेक न्यूज़ भी सरकार के पक्ष में और विरोधियों के खिलाफ बतौर हथियार इस्तेमाल होती है. इनको पहले आईटी सेल फोटोशॉप कर तैयार करती हैं फिर फर्जी वेबसाइटों पर चढ़ाया जाता है औऱ वहां से चैनलों द्वारा उठाया जाता है. कंटेंट फर्जी निकलने पर आमतौर पर कोई जिम्मेदारी नहीं ली जाती. 

    होते-होते आलम ये हुआ है कि देश के सर्वत्कृष्ट चैनल के दावेदार ने इसी तरह के सनसनीखेज़ औऱ घृणाधारित कंटेंट के जरिए लंबे समय से असली मुद्दों को दरकिनार कर अपनी बादशाहत बनाए रखी. खूब जी भर के सरकारी विज्ञापन भी कूटा. मज़े की बात ये है कि इसी नक्शे कदम पर चल कर एक नवोदित चैनल नंबर वन हो गय़ा. लेकिन असलियत ये है कि दोनों की राह वही है, जहां आज सुदर्शन टीवी खड़ा है. फर्क सिर्फ इतना है कि सुदर्शन टीवी कम निवेश कर के हेट कंटेंट में कम मुनाफा कमा रहा है, वहीं ये चैनल ज्यादा पैसा लगा कर ज्यादा फायदा उठा रहे हैं. अगर सुप्रीम कोर्ट 2014 से इन चैनलों के विज्ञापन के रिकॉर्ड खंगाले तो उसे बहुत सी चौंकाने वाली जानकारिया मिल सकती हैं. उसे जानकारी मिल सकती है कि मनमोहन सरकार को बदनाम करने औऱ मोदी की महाबली ली छवि पर आखिर कितना खर्च, किसने, किसके दम पर किया है. 

    दरसल ये हिंदी की टीवी पत्रकारिता का चारण-भाट काल है. इसमें चारण और भाट वैसे ही आल्हागान करते हैं जैसे कहा गय़ा है कि 

    बड़्डा चमचा महोबे का जामें सौ मन दाल अमाए

    बड़े खबइय्या महोबे वाले, चमचा साठ साठ लौ खाए

    ये हिंदू न्यूज़ चमचा चैनल पिछले छह साल से “मोदी है तो मुमकिन है” का नैरेटिव चला रहे हैं. इनके प्रिय विषय़ हैं- नरेंद्र मोदी सुपरमैन हैं, ज्ञाता हैं. संत हैं, पहुंचे हुए फकीर हैं. उनकी दाढ़ी कैसी लग रही है, मोर से उनकी दोस्ती, देसी खिलोने और देसी कुत्तों से उनका प्यार और उनके मन की बात. ये चैनल मंदी, महामारी और बेरोजगारी की बात नहीं करते.

    हिंदू न्यूज़ चैनल महामारी औऱ बेरोजगारी की बात ना भी करें तो भी बहुत से पत्रकार साथी कोरोना और बेरोजगारी की शिकार हो रहे हैं. इसकी वजह से खुदकुशी की खबरें आ रही हैं. मंदी की मार से बड़े-बड़े संस्थानों में छंटनी चल रही है.हजारों साथी सड़कों पर हैं. दरसल पत्रकार भी इंसान हैं. आज के दौर में परिवार पालने के लिए अपना ईमान, नैतिकता औऱ विचारधारा घर पर रख कर आना होता है. एक बीजेपी के बड़े वकील और चैनल मालिक तो घोषित तौर पर अपने कर्मचारियों से ये बात कहते हैं.

     लेकिन ये सब तो कठपुतली मात्र हैं, सबका मालिक एक है, जो सबको चला रहा है. मंदी और महामारी के बीच भी उसका लागत का एक तिहाई मुनाफा होता है. हर चैनल में उसका हिस्सा है, उसके खिलाफ कुछ भी खबर नहीं हो सकती. मोटाभाई बगैर मुनाफे का कोई खेल नहीं खेलता. हर पार्टी उसकी मोहताज़ है. संसद में भी बैठे हैं उसके बंदे, चाहे इधर-चाहे उधर. जब वो यूनाइटेड किंगडम की खिलौना कंपनी खरीदता है तो देश भर में देसी खिलौने की बात छेड़ दी जाती है. विदेशी कंपनियों को संकेत दिया जाता है कि अगर देश आना है तो उसी के गेटवे से हो कर गुजरना होगा. गूगल और फेसबुक हिस्सेदार बन चुकी है. अमेजन को भी मिल कर चलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. जल्द ही उसका अपना पेमेंट सिस्टम भी होगा औऱ देश में उसका ही सिक्का चलेगा. औऱ जब महामंदी के दौर में दुनिया भर में सरकारें अपने देश के पूंजीपतिय़ों और व्यवसायों को लेकर एकाधिकारी नीतिय़ों को अपना रही हैं, तब ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ये सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है. क्योंकि वो कहता है- कर लो दुनिया मुठ्ठी में.


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    Emergence of Hindu News channels, their rise and future

     
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