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  • मजबूरी को स्वभाव ना कहिए मोदीजी, खून में व्यौपार की निगाहों से ना देखा कीजे हुजूर..!! लेख- अंशुमान त्रिपाठी
  • May 19, 2020
  •                                              “मनुष्य के स्वभाव” औऱ “खून में व्यौपार” का फर्क

     

    -अंशुमान त्रिपाठी

     

                     इस वक्त गांव जाना मजबूरी है, मनुष्य का स्वभाव नहीं, मोदीजी

                     मानवीय आपदा में राजनीतिक अवसर तलाशना मानवता नहीं....

                    सिर्फ मजदूर ही नहीं पूरा देश सड़क पर है...

     

    “मनुष्य का स्वभाव है, संकट के समय वो घर जाना चाहता है”. इस वाक्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आम जन मानस की समझ को समझा जा सकता है. जाहिर है कि कोरोना औऱ लॉकडॉउन के वक्त भूख, भय, बेरोजगारी और तंगी से जूझ रहे लोगों की तकलीफ को पीएम मोदी ने कितने हल्के में लिया है. अपने छोटे-छोटे बच्चों औऱ बीवी लेकर तीन हज़ार किलोमीटर तक पैदल चल कर जाने के लिए सड़क पर उतरे मजदूर से पूछिए. वो बताएगा कि लॉकडॉउन के वक्त इक्कीस दिन का राशन बमुश्किल जुटाया था. अब अगर सड़क पर ना आते तो कमरों में ही भूख से मर जाते. वो तो अच्छा हुआ कि मकान-मालिक ने किराया ना दे पाने पर घर से निकाल दिया. दरसल ये “मनुष्य का स्वभाव नहीं, मजबूरी है”, मोदीजी. अगर सरकार दो वक्त का खाना मुहय्या करा सकती तो उन्हें क्या जरूरत है तीन हज़ार किलोमीटर के सफर पर भूखे-प्यासे बच्चों के साथ कोलतार पिघलाती धूप में निकलने की. फिर भी इन मजदूरों की मनुष्यता देखिए कि वो कहीं भी अराजक नहीं हुए, दुकानें नहीं लूटी, सिर्फ घर जाने से रोकने पर अपनी बेबसी की झलक दिखाई, रोष दिखाया, आक्रोश दिखाया. तीन-तीन दिन बिस्कुट पर बसर कर लिया, घर-गांव पहुंचने से पहले कुछ ने दम तक तोड़ दिया. लेकिन आपकी तरह हिंसक नहीं हुए, हवस नहीं दिखाई. पीएम मोदी, ये मनुष्य का स्वभाव है औऱ यही मनुष्यता है.

    लेकिन आपके तो  “खून में व्यौपार” है. क्योंकि “व्यौपारियों” के नुमाइंदे के रूप में आप राजनीति करते हैं, सो, आप खून में व्यौपार की बात भी खुले आम करते हैं. करना भी चाहिए. दुनिया ही पूंजावादी मॉडल पर चल रही है. व्यौपार जानना तो अच्छी बात है. लेकिन असलियत ये है कि आप व्यौपार या अर्थव्यवस्था कतई नहीं जानते. हां, आप अपनी खुदगर्जी को छिपाने के लिए व्यापारी बन जाते हैं. व्यौपारी कभी इतना संगदिल, खुदगर्ज और पत्थरदिल नहीं हो सकता.

    हैरानी है कि आपको इस बात का इल्म नहीं था कि डोनल्ड ट्रंप को बुला कर चुनावी रैली करवाना गुजरात खासकर अहमदाबाद, आगरा, मुंबई औऱ दिल्ली को कितना भारी पड़ सकता है. खुद आरटीआई से साफ हो गया है कि फऱवरी से लॉकडॉउन तक विदेश से आए सिर्फ 19 फीसदी यात्रियों की ही स्क्रीनिंग की गई है. मज़े की बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुले आम झूठ बोल रहे हैं. टीवी पर दावा कर रहे हैं कि कोरोना से लड़ाई में हमने सबसे पहले स्क्रीनिंग शुरू की थी. 

        मनुष्य का स्वभाव है कि वो अपने नेता की हर बात पर भरोसा कर रहा है. लेकिन नेता जिसके खून में व्यौपार है, वो जब बोलता है, झूठ बोलता है, झूठ के सिवा कुछ नहीं बोलता. वरना सड़क पर घर जाने को भटक रहे भूखे लोगों की मौत पर भी मौन लगा जाता है. उसे सिर्फ अपने सियासी मुनाफे की फिक्र है. आप जिस तरह मानवता पर तंज कस रहे हैं प्रधानमंत्रीजी, सच्चाई तो ये है कि आप जनता की आपदा को अपने लिए अवसर में बदलने में जुटे हुए हैं. लेकिन ये भी व्यौपार नहीं है. व्यौपारी जिससे कमाता है, उसके हित का भी खयाल रखता है ताकि वो भविष्य में भी कमा सके. आपको तो मनुष्य और मनुष्यता की फिक्र नहीं, आपको मंदी औऱ बंद बाज़ार की फिक्र है. आपको फिक्र ये है कि मजदूर चला जाएगा तो बाज़ार बंद हो जाएंगे, उद्योग बंद हो जाएंगे. ऐसे में उद्योगपति-पूंजीपति  आपको चुनाव लड़ने के लिए पैसा क्यों देंगे. मजदूर तो अगले चार साल में अपना दर्द भूल जाएगा, लेकिन उद्योगपति नहीं भूलेंगे. चुनाव आप पैसे और झूठ के दम पर जीतना जानते हैं. 

    लेकिन मोदीजी, आपका अहम ब्रह्मास्मि का भाव देश को ले डूबा है. और एक दिन आपको भी ले डूबेगा. आपको इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि चार-चार लॉकडॉउन में रोज कमाने, रोज़ खाने वाला किस तरह जिंदा रह पाएगा. उसके बच्चों और परिवार का क्या होगा. संवेदनहीनता की पराकाष्ठा तो तब हो गई जब सरकार खुद व्यौपारियों से मिली-भगत कर मजदूरों को शहरों में भूखे ही बंधुआ बनाने की साज़िश में शामिल हो जाती है. भूख से बिलबिलाता मजदूर जैसे ही बाहर निकलता है, पुलिस की लाठियों से ऊपर से नीचे तक बजा दिया जाता है. यकीन ना हो तो एक दिन गुजारिए गुजरात में. मालूम हो जाएगा कि गुजरात मॉडल क्या है. क्यों घर जाने को बेताब मजदूर आत्महत्या करने को मजबूर हो चुके हैं. लेकिन सरकार आपकी राज्य सरकारें अब तक उन्हें या तो अपने घर जाने नहीं दे रही हैं य़ा फिर उनके अपने प्रदेश आने नहीं दे रही हैं. 

    आपने गुजरात मॉडल के अपने प्रशासन औऱ राजकाज का डंका इतना पीटा कि भोली जनता ने आपको एक बार फिर पांच साल का वक्त दिया. लेकिन हैरानी इस बात की है कि आप सत्ता के मद में ये बात नहीं समझ पाए कि महामारी से ज्यादा भूख से पेट में उठती मरोड़  इंसान को पैदल ही तीन हज़ार किलोमीटर चल कर अपने गांव जाने के लिए मजबूर कर रही है. महामारी का तो खौफ ही ना रहा. लोग मरने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने गांव में. सच्ची बात तो ये है कि आपको राजतंत्र चलाने की आदत है. लोकतंत्र में भरोसा होता तो आप इन मजदूरों को उनके प्रदेश-गांव पहुंचाने के लिए बस और ट्रेनों की निशुल्क व्यवस्था करवाते. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के स्वागत के लिए जितना पैसा खर्च किया गया था,एक अनुमान के मुताबिक उतने खर्च में पूरे देश के प्रवासी मजदूर अपने अपने घरों को लौट सकते थे. लेकिन व्यौपारियों को लुभाने के लिए दुनिया के बड़े व्यौपारी ट्रंप पर देश की जनता को ही दांव पर लगा दिया गया. मीडिया में गुजरात औऱ खासकर अहमदाबाद में कोरोना संक्रमण की खबरों को बहुत हल्के में परोसा जा रहा है. यहां तक कि आगरा को भी. जिस टूरिस्ट गाइड ने ट्रंप परिवार को ताजमहल घुमाय़ा, वो भी संक्रमण से जूझ रहा है.

    व्यौपारी जोखिम ज़रूर लेता है मोदीजी, लेकिन घाटे का सौदा नहीं करता. आप व्यौपारी नहीं साहूकार हैं. तुरंत आपने नया पीएमकेयरफंड बना लिया जिसकी कोई बाहरी पड़ताल ना कर सके. जिसमें देश से ही नहीं, विदेश से भी पैसा मंगाया जा सके. जबकि केरल में तूफान के वक्त आपने विदेशों से अनुदान लेने की इज़ाजत नहीं दी थी. क्योंकि वहां वामसरकार थी. यही नहीं जो सुविधाएं और छूट आपने अपने पीएम केयरफंड में ले रखी है, राज्य सरकारों के सीएमकेयरफंड में उन पर पाबंदी है. ये साहुकारिता नही तो और क्या है. जो केंद्र सरकार मजदूरों को एक वक्त का खाना भी खिलाने को तैयार नहीं, वो लोगों से गहने दान मांग रही है. मजदूरों का जिम्मा भी राज्य सरकारों को दे दिया गया. ये भी परवाह नहीं की गई कि ज्यादातर राज्यों में बीजेपी या बीजेपी समर्थित सरकारें हैं. 

    खाना तो दूर की बात है जननायकजी, आपदा को अवसर में बदलने में आपकी सानी नहीं. आपने कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव के दबाव में मजदूरों के लिए ट्रेन चलाने की इज़ाजत दी. लेकिन उसमें भी किराया राजधानी के बराबर. कई ट्रेनों में तो दोगुना से भी ज्यादा किराया वसूलने का अवसर तैयार कर लिया गया. यहां तक कि कोई अपना टिकट नहीं ले पाया तो उसे उतार कर वापिस भेज देने तक की खबरें आईं. लिहाजा मजदूर अपने परिवार ले कर तीन हज़ार किलोमीटर तक पैदल ही चल पड़े. कोरोना नायक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देश में भूख से लड़ कर मरते मजदूरों के वीडियो और तस्वीरों ने पूरी दुनिया को हिला दिया. मोदी सरकार का मुखौटा उतर गया. जनता ने उम्मीद ही छोड़ दी. लेकिन चुनावी नुकसान देख फिर उन्हें जगह जगह रोकने की कोशिश की गई. राज्य सरकारों पर उनकी भूख और उनको ले जाने का ठीकरा फोड़ दिया गया. उस पर क्रूरता की हद तो ये हो गई कि सैकड़ों मजदूरों की सड़क दुर्घटनाओं में बलि चढ़ने के बावजूद विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को मदद के बजाय उनसे उलझ कर उनके काम में अड़चन डालने का मौका नहीं छोड़ा गय़ा. किसी मुख्यमंत्री के हाथों भगवे वस्त्र के प्रतीक का इतना निकृष्ट प्रयोग कभी इतिहास में नहीं हुआ. 

    मजदूरों के पलायन को “मनुष्य का स्वभाव” बता कर अपना रोष जताना सत्ता का अहंकार है.  आपने और आपकी सरकार ने अपने गिरेबां में कभी नहीं झांका. तकलीफ इस बात की है कि समय पर स्वास्थ्यकर्मियों को सुरक्षा किट तक समुचित मात्रा में उपलब्ध नहीं कराई गईं. और आज तक जगह जगह वो मास्क और पीपीई किटों की कमी से जूझते और संक्रमित होते हुए मरीजों की सेवा में जुटे हुए हैं.

    प्रधानमंत्रीजी, आपको शुरू से ही स्पष्ट था कि अगर व्यापक स्तर पर जांच की गई तो संक्रमण किस दर से फैल रहा है, ये सच्चाई सामने आ जाएगी. इसलिए आप कोरोना संक्रमण को एक पीआर इवेंट की तरह हैंडिल करने में जुटे रहे. कभी ताली-थाली बजवाते रहे तो कभी आसमान से फूल बरसवाते रहे. कितना अच्छा होता कि आप राष्ट्रीय राजमार्गों से रोटियां बरसवा कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करा पाते. जैसे जैसे कोरोना संक्रमण की बढ़ती जांच से हकीकत सामने आने लगी तो आपने शहर खाली करवा कर मीडिया की नज़रों से जनता के दर्द को छिपाने की साजिश शुरू कर दी. आपने मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी के इस मौके को भी वोटबैंक बनाने में इस्तेमाल किया. जमातियों के बहाने मुसलमानों को गांव-गांव बदनाम किया गया ताकि चुनाव आने पर आपके घृणाप्रचारक स्वयंसेवक आपके लिए वोट जुटा सकें. आपने पहले ही कपड़ों से पहचाने जाने की बात कर के पुलिस-व्यवस्था के हिदुत्वीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. इस भावना की बुनियाद पहले गोधरा में तो फिर शमशान-कब्रिस्तान के नारे के जरिए खुद आपने डाली है.

    आज आलम ये है कि कोरोना संक्रमण के सरकारी आंकड़े लाख के पार हो चुके हैं. और पूरे देश का हरेक गांव समझ रहा है कि घर लौट रहे लाखों मजदूर फिलहाल भूख और थकान से जूझ रहे हैं. ऐसे में इनमें संक्रमण का अंदाज़ कर पाना बेमानी है. इनमें से बहुत से लोग अपने घर की दहरी पर आखिरी सांस लेने लौट रहे हैं. ये भीतर से टूट चुके हैं. ये जानते हुए भी कि भूख मिटाने के लिए ये सामंती व्यवस्था से बगावत कर शहर भागे थे. आज ये भूख मिटाने के लिए ही वापिस गांव आने को मजबूर हैं. वाकई मानवता के इतिहास में आपका नाम लिखा जाना चाहिए प्रधानमंत्रीजी. आपने अपने अहंकार, और गुमान में करोड़ों देशवासियों को चुनावी जुएं में दाव पर लगा दिय़ा. हर दिन के साथ बदलते महंगे-फैशनपरस्त लिबास में त्याग-तपस्या, कर्तव्य और राष्ट्र का उपदेश पिलाते रहे.

    असलियत तो ये है कि क्रोनीज़ ने आप पर दांव लगा कर पूरे पूंजावादी मॉडल को ही तहस-नहस कर दिया. हालात ये है कि डाटा बेचने वाले अब आटा बेचने की जुगत लगा रहे हैं. आए दिन अपनी कंपनी के शेयर बेचने को मजबूर हो रहे हैं. ऐसे में मोदी सरकार कोरोना राहत पैकेज के नाम पर अरबों की सरकारी चल अचल संपत्ति वाली कंपनियों को कोड़ियों के मोल अपने उद्योगपति दोस्तों को बेचने का जुगाड़ बिठा रही है. तो दूसरी तरफ चीन से भाग रही कंपनियों को देश लाने के लिए इन गांव भागते मजदूरों के पैरों में कानूनी बेड़ियां पहना कर और बंधुआ बना कर उनके हवाले करने की भी तैयारी कर रही है. लेकिन इससे भी देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घूमने को तैयार नहीं है. यकायक लिए गए तुगलकिया फैसले से  28 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था का भारी भरकम पहिया रोक देना कोरोना संक्रमण से ज्यादा खतरनाक साबित हुआ है. अब इसको घुमाने के लिए “जोर लगा कर हैशा” वाले मजदूरों के मन की ताकत की ज़रूरत है ना कि आपके मन की बात की. आपने देश का ना सिर्फ बंटवारा कर दिया, बल्कि देश को एक बार फिर वहीं ले जा कर खड़ा कर दिया, जहां पार्टीशन के वक्त खड़ा था. तब इन्ही मजदूरों ने गांव से निकल कर नए भारत का निर्माण किया था.

    आज हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि मजदूर ही नहीं छोटे-मोटे काम-धंधे करने वाले भी शहर छोड़ गांव की शरण लेने को मजबूर हैं. लेकिन सवाल है कि क्या हमारी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का ढांचा इनका बोझ उठाने लायक ताकत रखता है. क्या ये अपने-अपने गांव, शहर और प्रांतों में अपने रोजगार के अवसर तलाश पाएंगे. ये बहुत दूर की बात नहीं, आज और कल की बात है, जब इन्हें जिंदा रहने के लिए कम से कम एक वक्त की रोटी अपने आसपास तलाशनी होगी. क्या यूपी, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अपने इन नागरिकों की भूख औऱ बीमारी से लड़ने में मदद की हालत में हैं.

    मोदीजी, आप चुनाव चार बरस दूर होने से बेफिक्र हैं. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा. आप तो फकीर आदमी हैं, जब तक सत्ता में हैं, सुख भोगेंगे. वरना झोला उठा कर चल देंगे. भुगतेगी देश की भोली जनता, जो आपको नेता कम संत ज्यादा समझ कर आपके मन की बात के पीड़ादायी नुस्खे आजमाने को मजबूर है.

    यहां ये बताना ज़रूरी है जननायकजी, अगर आपकी सरकार आने वाले महिनों में इन गरीब मजदूरों की भूख शांत करने का इलाज़ नहीं तलाश पाई तो आप जानते हैं कि मनुष्य का स्वभाव क्या होता है. तब आपके खून में व्यौपार का हुनर काम नहीं आएगा. जै रामजी की.

     

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