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  • गरीबों के प्रधानमंत्री की गरीबी का अहसास झूठा, समझ नहीं पाए कि बीमारी से ज्यादा भूख होती है भयानक
  • March 28, 2020
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      प्रधानमंत्रीजी !! कोरोना  संक्रमण से भी ज्यादा खतरनाक है भूख से मौत का खौफ.. बंद कीजिए गरीब के बेटे वाली नौटंकी...

    भूख से मरने से बचने के लिए देश के तमाम शहरों से लाखों प्रवासी मजदूर अपने अपने घर गांव के लिए निकल पड़े हैं. उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि वो पांच दिन में अपने गांव पहुंचेगें या रास्ते में ही दम तोड़ देंगे. उन्हें कोरोना का भी खौफ नहीं है. क्योंकि कोरोना तो बेहोश कर मारेगी जबकि भूख जीतेजी तड़पा कर जान ले लेगी. देश की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली-एनसीआर में ऐसा ही खौफनाक मंज़र देख कर लोग कांप उठे हैं. यूपी-बिहार, झारखंड और बंगाल में अपने अपने घर लौटने के लिए लोग अपने दुधमुंहे बच्चों को ले कर निकल पड़े हैं. 

    औऱ मीडिया देश के महानायक के मास्टर स्ट्रोक पर फिदा है. वो फिदा है कि सीएम योगी ने रात भर जाग कर नोएडा, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, हापुड़ आदि इलाकों में 1000 से ज्यादा बसें लगाकर मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचाने की व्यवस्था कराई। रात में ही मजदूरों और बच्चों के लिए भोजन का इंतज़ाम कराया गया।

    हमारे देश के कर्णधार कब समझेंगे कि वो जिस गरीब औऱ गरीबी की दुहाई दे कर देश की सबसे ऊंची गद्दी पर सवार होते हैं, उसी गरीब के खिलाफ काम करना शुरू कर देते हैं.  इन नेताओं को ये होश नहीं रहता कि अगर गरीब मारे गए तो अमीर भी नहीं बचेंगे. कुदरत ने इस बार दुनिया भर के पूंजीपतियों औऱ सत्ता के वहशियों को साफ संदेश दे दिया है.

    देश भर में लाखों प्रवासी मजदूर अलग –अलग राज्यों में फंसे हुए हैं.इनमें ज्यादातर ऐसे हैं जिनके पास अगर सुबह खाने के पैसे हैं तो शाम का पता नहीं. यही नहीं, इन्हें कमा कर घर भी भेजने की मजबूरी भी है ताकि घर-गांव में उनके घर की भी भूख मिट सके. दिल्ली के आनंद विहार इलाके में हज़ारों के तादाद में ऐसे ही गरीब, दिहाड़ी मजदूर अपने छोटे छोटे बच्चों औऱ महिलाओं के साथ पहुंच रहे हैं. ये जानते हैं कि दिल्ली सरकार कितना भी दावा करे लेकिन हर शख्स तक फूड सप्लाई बहुत आसान नहीं है. और आखिर कितने दिन तक. जब काम-धंधे ही बंद हो गए और जेब में पैसे ना हो तो घर परिवार के पास लौटने के अलावा इनके पास चारा भी क्या है. 

    ऐसे लॉकडॉउन से कोरोना संक्रमण की रोकथाम तो क्या बल्कि इन लाखों लोगों को वायरस के सामने फेंक दिया है. औऱ भूख से तड़पते लोगों को कोरोना के सामने लाचार पड़े हैं. इंसान भूख औऱ बीमारी से मौत में से हमेशा बीमारी से मौत को चुनता है. लेकिन जिस पीएम की पीठ पर उद्योगपति हाथ रखता हो, उसे तो उस वर्ग का दर्द समझ में आता है, जिस वर्ग के इकलौते आदमी को चार्टर प्लेन से लंदन से वापिस लाने के लिए वो सारी पाबंदिया हटा लेता है जो दुनिया भर के देशों की वायु सेवाओं पर लगाई गई हैं. 

     लेकिन तानाशाही बुद्धि हर लेती है. हमारे देश में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अहम ब्रह्मास्मि का भाव आ जाता है. उन्हें भरोसा होने लगता है कि वो ही सबसे बड़ी दैवीय ताकत हैं. और उनका भाषण वेदवाक्य हैं. अपने आप पर मोहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगर 8 पीएम कह कर कटाक्ष किया जाता है तो इसके पीछे उनके तुगलकी फैसले हैं. उन्होंने अपने सारे बड़े फैसले आगा-पीछा सोचे बगैर लिए औऱ खामियाज़ा जनता को भुगतना पड़ा. चाहे लॉक़डॉउन को ले कर फैसला हो या नोटबंदी औऱ जीएसटी का फैसला. नोटबंदी ने निम्न और मध्यम वर्ग को तबाह कर दिया. तो जीएसटी ने सूक्ष्म, मध्यम औऱ लघु उद्योगों पर तालाबंदी कर दी. औऱ बाकी बची कसर दिहाड़ी पर जीने वाले वर्ग के लिए किसी तैयारी के बगैर तीन हफ्ते के लॉकऑउट के ऐलान ने पूरा कर दिया. हैरानी की बात ये है कि इस तरह की तैयारियों को लेकर संसद और विपक्ष तो छोड़िए कैबिनेट को भी भरोसे में नहीं लिया जाता. संसद चलती रही और प्रधानमंत्री ने सदन में कोरोना पर सरकार की तैयारियों पर एक शब्द नहीं कहा. संसद की उपेक्षा कर वो विपक्ष और संसदीय लोकतंत्र के प्रति अपनी वितृष्जणा  जताने से नहीं चूके और उन्होंने सीधे रात 8 बजे राष्ट्र के नाम प्रसारण कर खुद को महानायक साबित करने का मौका भी नहीं गंवाया.

    जीहां, ये महज़ सरकार की कोताही औऱ लापरवाही नहीं, बल्कि मूर्खता है औऱ सिर्फ मूर्खता ही नहीं आपराधिक मूर्खता. क्या प्रधानमंत्री को मालूम नहीं कि वो अब गुजरात के प्रधानमंत्री नहीं है बल्कि 22 राज्य औऱ 8 केंद्रशासित प्रदेशों के प्रधानमंत्री हैं. क्या उन्हें मालूम नहीं कि इस देश की दो तिहाई जनता आज भी हर दिन कमाती है और हर दिन खाती है. क्या उन्हें गरीबी का दर्द मालूम नहीं जिसकी दुहाई दे कर  दो बार आमचुनाव में भोली जनता के वोट लूट चुके हैं. प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद रोजमर्रा के काम-धंधे बंद हो गए और उन पर निर्भर लोग भूखे पेट घरों में कैसे रह सकते थे. क्या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि अमीर औऱ सक्षम वर्ग के हित में दिहाड़ी मजदूर भूखे ही बंद कमरों में दम तोड़ दे. उन्होंने जनता को ही उपदेश दे दिया कि प्रत्येक नागरिक अपने पास पड़ोस के 9 परिवारों का पेट भरे. लेकिन इतनी हिम्मत उनकी मुकेश अंबानी औऱ गौतम अडानी को कहने की नहीं पड़ी जो बेहिचक उनकी पीठ पर हाथ रख कर दुनिया को संदेश देते हैं कि कौन मालिक औऱ कौन नौकर. आखिर कब लोकतंत्र को इन पूंजीपतियों और उनके गुलामों से आजादी मिलेगी. और अगर नहीं मिलेगी तो वो अभ ये जान लें कि प्रकृति ने खुद न्याय करना शुरू कर दिया है. मुनाफाखोरी बढ़ाने के लिए बांटो और राज करो की नीति से अब काम नहीं चलेगा. सब देख रहे हैं कि ऊपर वाले की लाठी की मार में आवाज़ नहीं होती.

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