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  • लक्षण बगैर संक्रमण के बढ़ते मामलों ने बढ़ाई चिंता, सरकार को रणनीति की समीक्षा की ज़रूरत,मजदूरों पर ही मंदी का दबाव
  • April 22, 2020
  •                      कहीं लॉकडॉउन खोलने में जल्दबाज़ी तो नहीं…!!!

            विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह पर गौर करने की ज़रूरत...!!

            लक्षणों के बगैर संक्रमण के मामलों की तादाद ने देश में बढ़ाई चिंता...!

            बगैर लक्षणों के बढ़ते संक्रमण के हिसाब से छूट देने की नीति पर पुनर्विचार की जरूरत..!!

            संक्रमण के बदले पैमाने पर कसे बगैर आर्थिक गतिविधियों की छूट क्यों !!

            मजदूरों के भी मानवाधिकार होते हैं मोदीजी…!!

             गरीब- मजदूरों के लिए सरकारी हमदर्दी के स्वांग पर सवाल  !  

             गरीब-मजदूर की राज्यों के बाहर आवाजाही पर ही रोक क्यों !

             क्या कोरोना मजदूरों को कपड़ों से पहचान लेता है !

             क्या निजी वाहनों में अच्छे कपड़े पहने लोग संक्रमण नहीं फैलाते हैं !

     

    देश में कोरोना संक्रमण से बढ़ती मौतों के बीच सोशल मीडिया पर सियासत का खेल जारी है. सत्तारूढ़ पार्टी के आईटी सेल ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को भी ट्रोल करना शुरू कर दिया है. डब्लूएचओ ने पूरी दुनिया में चल रहे लॉकडॉउन को कोरोना से निपटने के लिए नाकाफी बताया है. ये  संयोग है कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी इसी तरह की हिदायत सरकार को दी थी, जो बीजपी के सोशल मीडिया लड़ाकों को बहुत नागवार गुजरी है. और जब वो गुस्से में आते हैं तो वो डब्लूएचओ की भी नहीं सुनते हैं.

     लेकिन इसी से जुड़ी और भी डरावनी बात ये है कि कोरोना परीक्षणों में 80 फीसदी संक्रमण के मामले उन लोगों मं पाए गए हैं, जिनमें कोई भी लक्षण नज़र नहीं आया है. ये जानकारी आईसीएमआर यानि देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने दी है. इससे पहले ये बात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी ये बात कह चुक हैं. जाहिर है कि केंद्र सरकार को इस तथ्य की जानकारी है लेकिन वो देश में आने वाली आर्थिक सुनामी से बुरी तरह डरी हुई है. इस खतरनाक जानकारी के बावजूद केंद्र सरकार ने देश के 354 जिलों में आर्थिक गतिविधियों को कथित रूप से आंशिक छूट दे दी है. सरकार ने ग्रीन ज़ोन में आने वाले जिलों में किराना की दुकानों के अलावा कुछ अन्य व्यवसायिक गतिविधियों की इजाज़त दी है. 

    लेकिन गौर करने की बात ये है कि  केंद्र सरकार की राज्य सरकारों से कहना है कि कुछ आर्थिक गतिविधियों के लिए दी जा रही ढील के दौरान प्रवासी मजदूरों को एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. सवाल ये है कि ये प्रतिबंध मजदूरों पर ही क्यों. उनकी आवाजाही पर रोक की वजह अगर संक्रमण की रोकथाम है तो अब जब आईसीएमआर ने कह दिया है कि अस्सी फीसदी मामले असिंप्टोमेटिक यानि ऐसे मामले हैं जिनमें संक्रमण के लक्षण नज़र नहीं आते हैं. क्या ये महज संयोग है कि १९ अप्रेल के बाद आईसीएमआर ने कोविड संक्रमितों की संख्या का अपडेट वेबसाइट पर नहीं दिया है

     

          सवाल ये भी उठता है कि दो राज्यों के बीच छात्रों को लाने ले जाने के लिए यूपी और गुजरात जैसे बीजेपी शासित राज्यों को नियम तोड़ने का अधिकार मिला है, लेकिन गरीब शहरी मजदूर जो कटाई के वक्त खेतिहर मजदूर होता है, उसे चालीस दिन भूख से लड़ने के बावजूद अपने घर जाने का हक क्यों नहीं दिया जा रहा है. ऐसे में सिर्फ मजदूरों पर ही ये रोक क्यों. क्या संक्रमण अच्छे रहन-सहन,वेषभूषा औऱ निजी वाहन से यात्रा करने वालों के जरिए दूसरे राज्यों में नहीं पहुंचेगा. क्या कोरोना प्रधानमंत्री की तरह लोगों को कपड़े से पहचान लेता है.

    यहां भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया के बयान का जिक्र ज़रूरी हो जाता है. उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आम तौर पर कोरोना संक्रमण में इनक्यूबेशन पीरियड चौदह दिन का होता है, लेकिन भारत में देखा गया है कि कभी-कभी ये पीरियड तीस दिन तक चलता है. ऐसे में साफ है कि जरूरी नहीं कि कोरोना को उसके लक्षणों से पहचाना जा सके. वो साइलेंट कैरियर के रूप में भी काम कर रहा होता है. वहीं मेदांता के निदेशक डॉ. नरेश त्रेहान का कहना है कि 59 दिन के लॉकडॉउन से संक्रमण को काफी हद तक रोका जा सकता है. जाहिर है कि अभी सावधानी बरतनी जरूरी है. आईसीएमआर के एक वैज्ञानिक का कहना है कि अगले तीस दिन में संक्रमण अपने पीक पर पहुंचेगा. इस दौरान दोगुना होने की दर कम होगी लेकिन मामले तेज़ी से बढते दिखाई देंगे. साथ ही रिकवरी के मामले भी बढ़ेंगे. इसके अलावा जानकार भी संकेत दे रहे हैं कि मई के दूसरे हफ्ते में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर आने की आशंका है. यानि सरकार को इस दौरान संक्रमण को थामने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए.

     सच्चाई ये है कि सरकार साफ-साफ नहीं कह पा रही है कि मजदूर की आड़ में उसे व्यौपारियों और पूंजीपतियों की चिंता है. अगर ये गलत है तो क्या सरकार बताएगी कि शिविरों में रह रहे मजदूर के संक्रमित होने पर उसके परिवार के भरण-पोषण के लिए क्या उसके पास कोई ठोस योजना है सिवाय घड़ियाली आंसुओं के. मान लीजिए सरकार आर्थिक रूप से इतनी सक्षम नहीं है. तो कम से कम ये ही बता दिया जाए कि अगर मजदूर सरकार और स्थानीय प्रशासन के भरोसे रुक भी जाए तो जब तक प्रशासन उसे रोजगार मुहय्या नहीं करवा पाता तब तक क्या  सरकार के पास उसे किसी प्रकार का भत्ता देने की योजना है. जिस सरकार के मुखिया का कहना था कि मनरेगा को पिछली सरकार की कमजोरियों की यादगार के रूप में जिंदा रखा जाएगा. और सचमुच मनरेगा को करीब-करीब सुखा कर जिंदा रखा गया, ये वही श्रमिक-मजदूरों को कम से कम दो बार पेट पर वार करने वाली सरकार है. नोटबंदी में भी भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया गया. लाखों मजदूर भाग कर गांव गए. जब गांव में भी माली सुखाड़ नज़र आया तो बिचारे दोबारा शहर वापिस लौटे, किसी तरह सम्हलने की कोशिश कर ही रहा था कि लॉकडॉउन के नाम पर सवा महीने का उपवास पर भेज दिया गया. भूखे पेट मजदूरों से मोदीजी ने थाली और ताली भी बजवा ली. इस शोर में उनके बच्चों-महिलाओं की कराह दबा दी गई. इसके बाद वोटबैंक की चिंता हुई तो गरीब अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा और वैमनस्य का प्रचार शुरू करवा दिया गया. बीजेपी आईटी सेल ने गांव-गांव तक व्हाट्स अप से इस जहर को फैला भी दिया. जब गांव-गांव में हिंदू-मुस्लिम समाज में एक दूसरे के लिए जहर बो दिया गया तो संतों की तरह उपदेश दिया गया. 

       अब गरीबों की हिमायत का नया स्वांग रचा गया है. केंद्र सरकार ने आयुष समेत स्वास्थ्य सेवाएं,कृषि एवम् बागवानी,मछली पकड़ना,वृक्षारोपण (चाय,काफी और रबर) के साथ पशुपालन जैसी गतिविधियों को आंशिक छूट में शामिल किया है. इनमें सभी गतिविधियां समूह पर आधारित हैं, यानि सामूहिक गतिविधियां हैं. जब सरकार स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमणनिरोध के लिए सुरक्षा उपकरण देने में नाकाम है तो इन गतिविधियों में शामिल लोगों के जीवन से खिलवाड़ क्यों. खिलवाड़ ही नहीं, बल्कि मजदूरों से बलि लेने के बराबर है. क्योंकि शहर के बाहर की फैक्टरियों में कामकाज को अनुमति दी जा रही है. इसके लिए मजदूरों को फैक्ट्री तक  लंबा सफर करके पहुंचना पड़ेगा. उनको कार्यस्थल पर लाने-ले जाने की सुविधा प्राइवेट सेक्टर में बड़ी दूर की कौड़ी है. कहने को मंत्री समूह की बैठक में इस पर चर्चा की गई. जबानीजमां खर्च में क्या जाता है. 

    इन सबसे अहम बात ये है कि केंद्र सरकार कोरोना संक्रमण से कम प्रभावित इलाकों में आर्थिक गतिविधियों को अनुमति देने का फैसला किया है. सरकार ने कोरोना संक्रमण के मामलों के आधार पर किया है.  ये फैसला अपने आपमें बहद खतरनाक है. खासकर जब आईसीएमआर ने मान लिया है कि अस्सी फीसदी से ज्यादा संक्रमण  के मामलों में एक भी लक्षण नज़र नहीं आ रहे हैं. ऐसे में लॉकडॉउन खोलने की कोई भी कोशिश नागरिकों के लिए जानलेवा हो सकती है. क्योंकि पहले ये सुनिश्चित करना ज़रूरी होगा कि वो इलाके वाकई कोरोना संक्रमण से कम प्रभावित या अप्रभावित या फिर पूरी तरह उबर चुके हैं. इसके लिए व्यापक स्तर पर टेस्टिंग की जरूरत होगी. लेकिन माना जा रहा है कि सरकार के पास हरेक व्यक्ति के टेस्टिंग करने लायक पर्याप्त संसाधन नहीं है.  ऐसे में लक्षणों के आधार पर सामने आने वाले मामलों से किसी क्षेत्र के संक्रमण के प्रभाव के स्तर का अंदाज़ लगाना कतई गलत होगा. सबसे पहले तो व्यापक सेंपलिंग कर के रेंडम बेसिस पर उन क्षेत्रों में टेस्टिंग की जाए जिन्हें कोरोनामुक्त कहा जा रहा है, तब तक इन क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से आर्थिक गतिविधियां रोकनी चाहिए. जिन 354 जिलों को पूर्णतया कोरोनामुक्त बताया जा रहा है उनमें व्यापक स्तर पर टेस्टिंग की जरूरत है. क्योंकि हॉट जोन्स की तादाद दिनोंदिन कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है. ऐसे में और बारीकी से आकलन की आवश्यकता है. लेकिन सरकार के पास इतनी भी अकल नहीं होने की बात स्वीकार नहीं की जा सकती. बल्कि सच्चाई तो ये है कि केंद्र सरकार समझ चुकी है कि अब देश में संक्रमण का सही अंदाज़ लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. ऐसे में संक्रमण के ढलान पर आने तक इसके प्रसार की रणनीति बनाना मुश्किल है.

            केंद्र अगर सचमुच शहरी मजदूरों का हिमायती है तो किसी कार्ड या पहचान पत्र के बगैर उन्हें राशन उपलब्ध कराने में गुरेज क्यों है. हद से हद पचास लाख लोग गांव औऱ शहर के बीच रोजगार के लिए भटकते रहते हैं जिनके पास जरूरी कागज़ात नहीं हैं. आधार या यूडीआई भरोसेमंद नहीं है. एनपीआर को आधार बनाया जा सकता है, लेकिन एनपीआर को भी हिंदू-मुसलमान की पहचान की साज़िश से ऐसा जोड़ दिया गया है कि कोई भी सरकार पर भरोसा करने को तैयार नहीं है. ऐसे वक्त पर भी फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के भरे गोदामों में से अनाज गरीबों के बीच बांचने में क्या दिक्कत है. लेकिन बेरहम व्यौपारी सरकार ऐसे गाढ़े वक्त पर ही  एफसीआई में मौजूद अतरिक्त चावल सैनिटाइज़र बनाने के लिए और पेट्रोल में मिलाने के लिए अनुमति देती है. अगर सारी ज़िम्मेदारी राज्यों की ही है तो केंद्र सरकार औऱ उसका मुखिया सदगुरु की तरह मुंह पर कपड़ा बांध कर उपदेश देने के लिए है. मुसलमान भी अशिक्षा और सांप्रदायिकता को खुली छूट देने वाली केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं होने से कुछ जगह प्रशासन से सहयोग नहीं करता नज़र नहीं आ रहा है. ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी के मीडिा और सोशल मीडिया पर सक्रिय भेड़िए गरीबों में भी मुसलमानों को चुन चुन कर निशाना बना रहे हैं.लेकिन जब इस्लामिक देशों का संगठन एक घुड़की देता है तो तुरंत प्रधानमंत्री के हैंडल से एकजुटता औऱ भाईचारे का संदेश आ जाता है और उसको भारतीय राजदूत तुरंत अपने ट्विटर हैंडल से शेयर करता है. हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के निर्यात के लिए अमेरिका की घुड़की का असर पिछले दिनों छप्पन इंच के महानायक पर देखने को मिल चुका है. वहीं शेर की खाल ओढे सियार गरीब अल्पसंख्यकों को बेइज्जत करने से ले कर घेर कर मारने तक से बाज़ नहीं आ रहे हैं.   

     प्रधानमंत्रीजी! सच तो ये है कि अगर कोरोना से निपटना है तो हिंदू-मुसलमान से आपको और आपकी पार्टी को भी उबरना होगा. क्योंकि अब मानवता को अगर बचाना है तो नफरत का व्यौपार बंद कर दीजिए. जो ट्वीट आपने हाल में किया है, उसे चुपके चुपके घर में पढ़ा कीजिए…

     

    -अंशुमान त्रिपाठी

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